8 करोड़ का टैक्स चुकाया, लेकिन फिर भी हार गईं कांग्रेस की उम्मीदवार… तेलंगाना के इस नगर निगम में अजीब खेल

तेलंगाना के निजामाबाद नगर निगम चुनावों में पैसे की ताकत और जनता के फैसले के बीच जो नजारा देखने को मिला, वह इतिहास रच गया. निजामाबाद नगर निगम की 19वीं डिवीजन से कांग्रेस की मेयर प्रत्याशी के. शमंता ने अपना नोमिनेशन करवाने के लिए नगर निगम के खजाने में पिछले 17 सालों का बकाया टैक्स, जो कि करीब 8 करोड़ 16 लाख रुपये था, चुका दिया, लेकिन जब वोटों की गिनती हुई, तो जनता ने उन्हें उनके ही डिवीजन में BJP उम्मीदवार के हाथों करारी शिकस्त दी. यह घटना उस वक्त की है, जब चुनाव परिणाम घोषित हुए और भारी निवेश के बावजूद कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा.
क्या है पूरा मामला?
जब इस पूरे मामले को गहराई से समझ गया, तो एक हैरान करने वाला सच सामने आया. दरअसल, कांग्रेस प्रत्याशी शमंता के पति नरेंदर रेड्डी शहर के एक प्रमुख होटल के मालिक हैं. मेयर की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित थी और कांग्रेस ने शमंता को पहले ही मेयर प्रत्याशी घोषित कर दिया था. नोमिनेशन दाखिल करने के लिए नो ड्यू सर्टिफिकेट (No Due Certificate) होना जरूरी था, लेकिन उनके नाम 2009 से लंबित भारी प्रॉपर्टी टैक्स था.
सूत्रों के मुताबिक, जब निगम के अधिकारियों ने सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया, तो परिवार ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. अदालत में आधी रात तक चली सुनवाई के बाद साफ कह दिया कि कानून के सामने सब बराबर हैं और बकाया चुकाए बिना नामांकन संभव नहीं. इसके बाद चुनाव की अंतिम तारीख को परिवार को 6 डिमांड ड्राफ्ट (DD) के जरिए 8.16 करोड़ रुपये जमा करने पड़े. निजामाबाद निगम इतिहास में एक व्यक्ति से इतनी बड़ी रकम एक साथ आई है, जिसने खजाने को भर दिया.
चुनावी प्रक्रिया के दौरान दिखी प्रशासनिक अनियमितता
इस पूरे प्रकरण ने स्थानीय राजनीति के वो चेहरे दिखाए, जो अक्सर छिपे रहते हैं. आम आदमी से नगर निगम अक्सर 100-200 रुपये के टैक्स के लिए कड़ी कार्रवाई करता है, लेकिन पिछले 17 साल तक इस भारी बकाये को वसूल न पाना प्रशासनिक अनियमितता को दर्शाता है.
चुनाव के दौरान यह भी चर्चा थी कि मेयर बनने के चक्कर में शमंता ने वोटरों को प्रति वोट 5,000 से 10,000 रुपये तक दिए और कुल मिलाकर 20 करोड़ रुपये खर्च किए. लोगों का कहना था कि जो व्यक्ति इतनी बड़ी रकम टैक्स के रूप में नहीं दे सका, वो चुनाव में इतना खर्च कैसे कर रहा है? यह सवाल जनता के मन में गहरा था.
निगम को हुआ फायदा, कांग्रेस प्रत्याशी को लगा झटका
परिणाम यह रहा कि जनता ने पैसे के लोभ से ऊपर उठकर फैसला सुनाया. मेयर प्रत्याशी अपने ही डिवीजन में BJP के हाथों हार गईं. काउंटिंग सेंटर से वे निराश होकर लौटीं. यह घटना साबित करती है कि चुनाव आने पर ही बकाये वसूल होते हैं, लेकिन वोटें सिर्फ पैसे से नहीं खरीदी जा सकतीं. निगम को तो मुनाफा हुआ, लेकिन कांग्रेस को इस ‘सॉफ्ट सीट’ को गंवाने का बड़ा झटका लगा है. यह चुनाव उन राजनेताओं के लिए एक सबक है, जो सत्ता के लिए जनता को कमजोर समझते हैं.



