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छुट्टी रद्द… कर्मचारी बंधुआ मजदूर?
लखनऊ के अमौसी जोन में आदेश पर उठे गंभीर सवाल
UPPCL Media – विशेष रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अमौसी जोन में जारी एक आदेश ने विभागीय कर्मचारियों के बीच भारी नाराजगी और सवालों का तूफान खड़ा कर दिया है। जहां शासन द्वारा घोषित अवकाश कर्मचारियों को पारिवारिक दायित्व निभाने का अवसर देता है, वहीं लेसा के अमौसी जोन में एक आदेश ने कर्मचारियों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है। अब इस फैसले पर कई गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

मुख्य अभियंता कार्यालय से जारी आदेश के अनुसार 14 मार्च (द्वितीय शनिवार) और 15 मार्च (रविवार) को कार्यालय खोलकर राजस्व वसूली, मीटर स्थापना तथा झटपट पेंडेंसी समाप्त करने का निर्देश दिया गया है।
इस आदेश के आधार पर अधिशासी अभियंता द्वारा कर्मचारियों की छुट्टी निरस्त कर दी गई। आदेश में राजस्व वसूली, मीटर स्थापना और झटपट पेंडेंसी समाप्त करने का हवाला दिया गया है। लेकिन सवाल यह है कि —
क्या “निगम हित” के नाम पर कर्मचारियों की छुट्टियां निगल लेना ही प्रशासनिक दक्षता है?
UPPCL Media के सीधे और तीखे सवाल
- 🔴 क्या छुट्टी रद्द करना कर्मचारियों के अधिकारों का खुला उल्लंघन नहीं है?
- 🔴 यदि छुट्टी रद्द करना अनिवार्य था तो निगम नियमों के अनुसार प्रतिकर अवकाश (Compensatory Leave) का उल्लेख आदेश में क्यों नहीं किया गया?
- 🔴 क्या कर्मचारियों का कोई परिवार, सामाजिक दायित्व और व्यक्तिगत जीवन नहीं होता?
- 🔴 कार्यालय समय 10 बजे से 5 बजे निर्धारित होने के बावजूद देर रात तक काम लेना और छुट्टी भी खत्म कर देना — क्या यही कर्मचारी कल्याण है?
छुट्टी का इंतजार… और आदेश से खत्म
विभागीय कर्मचारी पूरे सप्ताह फील्ड की कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं — भीषण गर्मी, बिजली फॉल्ट, शिकायतें और राजस्व वसूली का दबाव। ऐसे में शनिवार और रविवार की छुट्टी ही वह समय होता है जब कर्मचारी अपने परिवार, बच्चों और सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए समय निकाल पाते हैं।
लेकिन अमौसी जोन में ऐसा लगता है कि कुछ अधिकारियों को कर्मचारियों के परिवार और जीवन से कोई सरोकार नहीं है।
शायद साहब को न भूख लगती है, न बीमारी होती है
ऐसा प्रतीत होता है कि छुट्टी रद्द करने वाले अधिशासी अभियंता महोदय के पास
- न परिवार है
- न सामाजिक दायित्व
- न बीमारी
- न थकान
और शायद यही कारण है कि उन्हें लगता है कि दो दिन में ही विभाग की सारी पेंडेंसी समाप्त हो जाएगी और उसके बाद कभी कोई काम शेष नहीं रहेगा।
यदि छुट्टी रद्द है तो परिवार की जिम्मेदारी कौन लेगा?
यदि कर्मचारी को छुट्टी के दिन भी काम करना पड़ेगा, तो क्या प्रबंधन यह व्यवस्था करेगा कि
- बच्चों की देखभाल कौन करेगा
- बीमार माता-पिता को अस्पताल कौन ले जाएगा
- पारिवारिक दायित्व कौन निभाएगा?
या फिर विभाग को यह भी आदेश जारी कर देना चाहिए कि छुट्टी रद्द करने वाले अधिशासी अभियंता विवेक प्रकाश को चाहिए कि जिन अधिकारियों-कर्मचारियों की छुट्टियाँ रद्द की गई हैं, उनके पारिवारिक दायित्व निभाने के लिए अपने परिवार या खानदान से किसी-किसी को उनके घर भेज दें। ताकि कर्मचारी निश्चिंत होकर विभागीय हित में काम कर सकें और उनके परिवारिक दायित्व भी प्रभावित न हों।
तस्वीर का दूसरा पहलू…
हालांकि पूरे प्रकरण को यदि निष्पक्ष नजर से देखा जाए, तो अधिशासी अभियंता विवेक प्रकाश को पूरी तरह दोषी ठहराना भी उचित नहीं माना जा सकता। दरअसल, उपलब्ध आदेश के अनुसार इस प्रकार की व्यवस्था लागू करने के लिए मुख्य अभियंता अमौसी जोन, राज कुमार द्वारा पत्र जारी कर निर्देशित किया गया है।

ऐसी स्थिति में अधिशासी अभियंता के स्तर पर उस आदेश का अनुपालन करना प्रशासनिक दृष्टि से लगभग अनिवार्य हो जाता है। विभागीय व्यवस्था में अधीनस्थ अधिकारी प्रायः उच्च अधिकारी के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं।
इसलिए यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अधिशासी अभियंता विवेक प्रकाश ने संभवतः स्वेच्छा से नहीं बल्कि उच्च स्तर से प्राप्त निर्देशों के अनुपालन में यह आदेश जारी किया।
अब असली प्रश्न यह उठता है कि —
- क्या कर्मचारियों की छुट्टी निरस्त करने जैसे निर्णय लेने से पहले नियमों और कर्मचारी हित का समुचित परीक्षण किया गया?
- यदि अवकाश के दिन कार्य कराया जाना आवश्यक था, तो प्रतिकर अवकाश (Compensatory Leave) का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं किया गया?
- और सबसे महत्वपूर्ण, क्या ऐसे निर्णय नीति स्तर पर लिए जा रहे हैं या परिस्थितियों के दबाव में?
स्पष्ट है कि इस पूरे मामले में जवाबदेही केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्णय की पूरी प्रशासनिक श्रृंखला पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल – Labour Law कहाँ है?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या कॉर्पोरेशन Labour Law और सेवा नियमों को भी अनदेखा कर सकता है? यदि कर्मचारियों से अवकाश के दिन कार्य कराया जाता है तो प्रतिकर अवकाश या वैधानिक लाभ देना अनिवार्य होता है। लेकिन आदेश में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
UPPCL Media की चेतावनी
यदि यही रवैया जारी रहा तो यह सवाल और तेज होगा कि क्या बिजली निगम में अधिकारी-कर्मचारी सेवा कर रहे हैं या बंधुआ मजदूरी?
कर्मचारी विभाग की रीढ़ हैं — यदि उनके अधिकार और सम्मान की अनदेखी की जाएगी, तो यह केवल असंतोष ही नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता का संकेत होगा।



