शिमला नगर निगम में बवाल, मेयर की कुर्सी पर सवाल, बीजेपी ने कार्यकाल को बताया असंवैधानिक

नगर निगम शिमला की मासिक बैठक शुक्रवार (27 फरवरी) को अखाड़े में तब्दील हो गई. मेयर के कार्यकाल की कानूनी वैधता को लेकर बीजेपी और कांग्रेस पार्षदों के बीच जबरदस्त टकराव हुआ, जिसके चलते सदन की कार्यवाही पूरी तरह बाधित रही. विपक्ष ने मेयर के सदन चलाने के अधिकार पर सवाल उठाते हुए बैठक का बहिष्कार कर दिया और जमकर नारेबाजी की。
बैठक शुरू होने से पहले ही बीजेपी पार्षद सरोज ठाकुर ने मेयर की कुर्सी पर सवाल दाग दिया. उन्होंने पूछा कि जब मेयर का कार्यकाल बढ़ाने वाले विधेयक पर महामहिम राज्यपाल के हस्ताक्षर नहीं हुए हैं, तो वह किस आधार पर सदन का संचालन कर रहे हैं. बीजेपी का तर्क है कि मेयर का निर्धारित ढाई साल का कार्यकाल 14 नवंबर को ही समाप्त हो चुका है.
‘महिला आरक्षण’ के मुद्दे पर कांग्रेस घेराव
विपक्ष ने कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाते हुए इसे महिला विरोधी करार दिया. पार्षदों का कहना है कि तय रोस्टर के मुताबिक, ढाई साल बाद यह पद महिला के लिए आरक्षित होना था, लेकिन सरकार ने अध्यादेश के जरिए कार्यकाल बढ़ाकर महिला पार्षदों का हक मारा है. बीजेपी के अनुसार, कार्यकाल बढ़ाने वाला सरकारी अध्यादेश भी 6 जनवरी को निष्प्रभावी हो चुका है.
निलंबन की धमकी और तीखी बहस
हंगामे के बीच माहौल तब और गरमा गया जब मेयर ने कृष्णानगर के पार्षद बिट्टू पन्ना को सस्पेंड करने की चेतावनी दी. बीजेपी पार्षदों ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि जिसके पास खुद पद पर बने रहने का नैतिक और कानूनी अधिकार नहीं है, वह पार्षदों पर कार्रवाई की बात कैसे कर सकता है. इस गहमागहमी के बीच बीजेपी पार्षद नारेबाजी करते हुए सदन से बाहर निकल गए.
अदालत के फैसले पर टिकी निगाहें
यह पूरा मामला अब हिमाचल हाईकोर्ट की चौखट पर है, जहां 2 मार्च को अहम सुनवाई होनी है. याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अध्यादेश की समय सीमा समाप्त होने के बाद मेयर को तुरंत पद से हटाया जाना चाहिए और रोस्टर के अनुसार नए चुनाव होने चाहिए. फिलहाल, निगम की राजनीति इस संवैधानिक विवाद के कारण पूरी तरह गरमाई हुई है.



