राजनीति

बंगाल में दो सीटों पर चुनाव जीते हुमायूं कबीर! बीजेपी सरकार में बाबरी मस्जिद बनेगी या सिर्फ बनेगा चुनावी मुद्दा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अप्रत्याशित चेहरा सबसे बड़ी चर्चा का विषय बन गया- हुमायूं कबीर. ममता बनर्जी की TMC से निलंबित किए गए इस नेता ने अपनी नवगठित आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के बैनर पर न सिर्फ रेजीनगर बल्कि नौदा सीट पर भी शानदार जीत दर्ज की. मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने के वादे ने उन्हें बीजेपी शासित बंगाल में एक बड़े संकट की ओर भी धकेल दिया है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हुमायूं कबीर अपने वादे को पूरा कर पाएंगे, या फिर बाबरी मस्जिद अगले 5-10 सालों का एक स्थायी चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगी?

हुमायूं कबीर की ऐतिहासिक जीत: बीजेपी और TMC दोनों के लिए बड़ा झटका

हुमायूं कबीर ने 2026 के विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर जीत दर्ज कर बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया. रेजीनगर सीट पर उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी बापन घोष को 58,876 मतों के बड़े अंतर से हराया. कबीर को 1,23,536 वोट मिले, जबकि बीजेपी को सिर्फ 64,660 वोट मिले और TMC 41,718 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गई.

नौदा सीट पर भी कबीर ने बीजेपी के राणा मंडल को 27,943 वोटों के अंतर से हराया. यह जीत इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरे बंगाल में बीजेपी-TMC के बाहर जो 6 सीटें जीती गईं, वे सभी मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीतीं. इनमें अकेले हुमायूं कबीर के नाम दो सीटें हैं. खुद कबीर ने इस जीत को अल्पसंख्यकों के साथ हुए अन्याय का जवाब बताया और कहा कि उनकी पार्टी महज चार महीने पहले बनी थी, इसलिए यह जनादेश और भी खास है.

बाबरी मस्जिद का सपना: नींव रखी जा चुकी है, लेकिन राह आसान नहीं

हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद का मुद्दा जानबूझकर चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया. उन्होंने 6 दिसंबर 2025 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की 33वीं बरसी के दिन मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में मस्जिद की आधारशिला रखी. यह जमीन लगभग 11 एकड़ की निजी भूमि पर है और पूरे प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 86 करोड़ रुपये है. कबीर ने मस्जिद को दो साल में पूरा करने का दावा किया है और धन जुटाने के लिए बांग्लादेश और मिडिल ईस्ट से भी मदद ली जा रही है.

लेकिन अब सबसे बड़ी अड़चन यह है कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो चुका है और बीजेपी की सरकार आ चुकी है. गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान साफ कह दिया था,’यह भारत है और कोई भी आदमी यहां बाबरी मस्जिद नहीं बना सकता. अगर बीजेपी की सरकार बनती है तो हम बंगाल की धरती पर बाबरी मस्जिद नहीं बनने देंगे, चाहे इसके लिए हमें कुछ भी करना पड़े.’

कानूनी-प्रशासनिक अड़चनों का जाल

हालांकि जमीन निजी है, लेकिन बीजेपी सरकार के पास निर्माण रोकने के कई रास्ते हैं:

  • पहला रास्ता: भूमि उपयोग और भवन निर्माण की अनुमति का है. कोई भी बड़ा धार्मिक ढांचा बनाने के लिए स्थानीय नगर निकायों और राज्य सरकार की मंजूरी अनिवार्य होती है, जिसे बीजेपी सरकार आसानी से रोक सकती है.
  • दूसरा रास्ता: शांति भंग और सांप्रदायिक तनाव का तर्क है. सरकार यह कहकर निर्माण पर पाबंदी लगा सकती है कि इससे इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैलने की आशंका है.
  • तीसरा रास्ता: प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आयकर विभाग के जरिए से फंडिंग की जांच. कबीर पर पहले से ही उनके रिश्तेदारों के ड्रग तस्करी से जुड़े होने के आरोप हैं और 10 करोड़ रुपये की संपत्ति अटैच हो चुकी है.

तो क्या अगले 5-10 सालों का चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगी बाबरी मस्जिद?

यहीं पर यह सवाल और भी दिलचस्प हो जाता है. पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का साफ मानना है कि बाबरी मस्जिद का मुद्दा बंगाल की राजनीति में एक स्थायी किस्सा बनकर रह जाएगा, जो हर चुनाव में गूंजता रहेगा. इसकी कई ठोस वजहें हैं:

  • हुमायूं कबीर के लिए यह मस्जिद उनकी पूरी राजनीति की धुरी बन चुकी है. अगर वह पीछे हटते हैं तो उनके समर्थकों के बीच उनकी विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी. उनकी राजनीतिक मजबूरी उन्हें इस मुद्दे को जिंदा रखने के लिए मजबूर करेगी.
  • बीजेपी के लिए भी यह मुद्दा किसी वरदान से कम नहीं. मुर्शिदाबाद में 66% मुस्लिम आबादी है. वहां बाबरी मस्जिद का विरोध हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण का सबसे मजबूत हथियार बन गया है. 2021 में जहां बीजेपी को मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी दिनाजपुर की 43 सीटों में सिर्फ 8 सीटें मिली थीं, वहीं 2026 में यह आंकड़ा 19 हो गया. बीजेपी इस मुद्दे को आने वाले नगर निकाय और पंचायत चुनावों में भी भुनाना चाहेगी.
  • कबीर ने अब खुद को अखिल भारतीय स्तर पर मुस्लिम अस्मिता की राजनीति का चेहरा बनाने की कोशिश शुरू कर दी है. असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM से उनका गठबंधन (जो बाद में टूट गया) यह दिखाता है कि वह सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रहना चाहते. बाबरी मस्जिद न बनने की स्थिति में भी यह मुद्दा ‘मुस्लिमों के साथ अन्याय’ और ‘बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे’ की नैरेटिव को आगे बढ़ाने का औजार बनता रहेगा.
  • 2028 के लोकसभा चुनाव और 2031 के अगले विधानसभा चुनाव में बाबरी मस्जिद का मामला एक बार फिर केंद्रीय मुद्दा बनेगा, चाहे मस्जिद बनी हो या नहीं. कांग्रेस और वाम दल भी इसे बीजेपी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, जबकि बीजेपी इसे अपने हिंदुत्व के एजेंडे को मजबूत करने का औजार बनाएगी.

बहरहाल, बीजेपी सरकार के रहते बाबरी मस्जिद का निर्माण पूरा हो पाना मुश्किल लग रहा है. अगर कबीर कानूनी लड़ाई लड़ते हैं, तो यह मामला सालों तक अदालतों में घिसटता रहेगा और 2030 तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ पाएगा. दूसरी ओर, बीजेपी सरकार की हर कार्रवाई विपक्ष को बीजेपी को ‘मुस्लिम विरोधी’ साबित करने का मौका देती रहेगी.

AZMI DESK

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