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Sabrimala Case: ‘विद्वानों के विचारों का सम्मान, लेकिन…’, सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा क्यों कहा?

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  • जैन संस्था की दलील: धार्मिक परंपराओं की अनिवार्यता कोर्ट का काम नहीं।

सबरीमाला मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश को लेकर शुरू हुआ मामला सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प होता जा रहा है. कोर्ट में बहस धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और महिलाओं के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर चल रही है. इस दौरान हिंदू संगठनों के अलावा मुस्लिम, दाऊदी वोहरा, पारसी और जैन संगठनों की तरफ से भी दलीलें रखी जा रही हैं, क्योंकि कोर्ट के फैसले का असर सभी पर समान रूप से पड़ने वाला है.

‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ का जिक्र

सोशल मीडिया पर फैलने वाली फर्जी जानकारी के लिए प्रचलित शब्द ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ का इस्तेमाल गुरुवार (23 अप्रैल, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने भी किया. 9 जजों की बेंच में चल रही सुनवाई के 8वें दिन दाऊदी वोहरा समुदाय की संस्था का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर सांसद शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया.

इस पर भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत ने कहा, ‘लेखकों के विचारों का कोर्ट सम्मान करता है, लेकिन बहस कानून के आधार पर होना ही बेहतर है.’ इस पर बेंच की सदस्य जस्टिस बीवी नागरत्ना ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, ‘ज्ञान का सम्मान होना चाहिए, बशर्ते वह व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से आया हुआ न हो.’

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मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर दलील

एक मुस्लिम संस्था की तरफ से वरिष्ठ वकील एम. आर. शमशाद ने मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चर्चा की. उन्होंने कहा कि इस्लाम में महिलाओं का नमाज के लिए मस्जिद जाना अनिवार्य नहीं है, उन्हें घर पर भी बराबर पुण्य मिलता है.

इस पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा, ‘आप यह भी बताइए कि हदीस में ऐसा कहे जाने के पीछे क्या कारण बताया गया है? वह कारण यह है कि घर पर बच्चों की देखभाल के लिए भी कोई होना चाहिए.’

इस्लाम में मस्जिद की अनिवार्यता पर चर्चा

शमशाद ने कहा कि एक तरफ मस्जिद में महिलाओं को जाने देने की मांग की जा रही है, वहीं सुप्रीम कोर्ट ही ‘इस्माइल फारूकी’ केस में कह चुका है कि नमाज के लिए मस्जिद का होना अनिवार्य नहीं है. इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘लेकिन यह कहना तो वैसा ही है जैसे कोई कहे कि हिंदू धर्म में मंदिर का होना अनिवार्य नहीं है.’ शमशाद ने कहा, ‘बिल्कुल, हम यही दलील देते रहे हैं, लेकिन दुर्भाग्य से इस्माइल फारुकी फैसला सुप्रीम कोर्ट की कई और फैसलों का आधार बन चुका है.’

जैन संस्था की दलील

जैन आचार्य युगभूषणसूरी जी के निर्देश पर गीतार्थ गंगा के नाम से दाखिल हुई याचिका की पैरवी वरिष्ठ वकील कृष्णन वेणुगोपाल ने की. उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की सीमा स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था है. इनके हनन होने पर सरकार या कोर्ट दखल दे सकते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ ‘अनिवार्य धार्मिक परंपराओं’ को संरक्षण देने का सिद्धांत बना दिया. किसी धार्मिक परंपरा की अनिवार्यता की जांच करना कोर्ट का काम नहीं है.

वेणुगोपाल ने यह भी कहा कि ‘सम्मेद शिखरजी’ समेत कई प्राकृतिक रचनाएं हैं, जो जैन तीर्थंकरों से जुड़े होने के चलते पूजनीय हैं. सरकार को भूमि अधिग्रहण का अधिकार है, लेकिन उसे ऐसी जगहों का अधिग्रहण नहीं करने देना चाहिए.

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AZMI DESK

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