आजमगढ़

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जानकीपुरम ज़ोन के बिजली विभाग में सामने आया यह मामला सिर्फ एक संविदाकर्मी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ही विभाग में कार्यरत कर्मचारी द्वारा समानांतर रूप से CSC सेंटर का संचालन करना न केवल विभागीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह स्पष्ट रूप से “डुअल जॉब” की श्रेणी में आता है, जो नियमों के अनुसार दंडनीय है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह सब वर्षों से कैसे चलता रहा? क्या संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी गईं? यदि नियमों का पालन सभी के लिए अनिवार्य है, तो फिर कुछ लोगों को विशेष छूट क्यों दी जा रही है?

लखनऊ। राजधानी के जानकीपुरम जोन स्थित बिजली विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि नियमों की खुली अनदेखी और कथित संरक्षण का है। जीपीआरए उपकेंद्र पर तैनात एक संविदाकर्मी द्वारा एक साथ दो भूमिकाएं निभाने का मामला सामने आने से विभागीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सूत्रों के मुताबिक, दीपक मौर्य नाम का संविदाकर्मी वर्षों से विभाग में कार्यरत रहते हुए समानांतर रूप से कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) भी चला रहा है। हैरानी की बात यह है कि यह पूरा खेल विभागीय परिसर के अंदर ही चल रहा था, और जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे रहे।

पहले भी इस संविदाकर्मी को लेकर खबरें सामने आई थीं, जिसमें उसके इस्तीफे की बात कही गई थी। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है—दीपक मौर्य आज भी न सिर्फ कार्यरत है, बल्कि खुलेआम “दीपक CSC सेंटर” के नाम से काउंटर संचालित कर रहा है।

बड़ा सवाल:
क्या बिना उच्च अधिकारियों की जानकारी के यह संभव है? या फिर यह पूरा मामला ‘ऊपर तक सेटिंग’ का नतीजा है?

जानकारी यह भी मिल रही है कि उक्त संविदाकर्मी को मुख्य अभियंता स्तर से संरक्षण प्राप्त है। जानकीपुरम के मुख्य अभियंता वी.पी. सिंह की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ एक कर्मचारी का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल है।

नियम क्या कहते हैं?
विभागीय नियमों के अनुसार, कोई भी संविदाकर्मी एक साथ दो अलग-अलग कार्य नहीं कर सकता। ऐसा करना स्पष्ट रूप से ‘डुअल जॉब’ की श्रेणी में आता है, जो दंडनीय अपराध है।

अब क्या होगा?
मामला उजागर होने के बाद अब निगाहें उच्च अधिकारियों पर टिक गई हैं। क्या यह मामला भी जांच के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा, या फिर जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई होगी? क्या एफआईआर दर्ज होगी या फिर ‘मेहरबानी’ का सिलसिला जारी रहेगा? मामले में यह भी चर्चा है कि संबंधित संविदाकर्मी को उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त है। यदि यह सच है, तो यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर गहरी जड़ें जमा चुकी पक्षपात की मानसिकता को उजागर करता है।

विभागीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या इस मामले में निष्पक्ष जांच होगी, या फिर इसे भी अन्य मामलों की तरह दबा दिया जाएगा? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी, या फिर सिर्फ औपचारिकता निभाई जाएगी?

जनता यह जानना चाहती है कि नियमों का पालन होगा या नहीं। क्योंकि जब सिस्टम ही नियम तोड़ने लगे, तो भरोसा टूटना तय है।

“पारदर्शिता जरूरी है, कार्रवाई अनिवार्य है!”

यूपीपीसीएल मीडिया की नजर इस पूरे मामले पर बनी हुई है।

AZMI DESK

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