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⚡ स्मार्ट मीटर योजना पर उठे सवाल, ऐप और कमीशन को लेकर नई चर्चा

लखनऊ | विशेष रिपोर्ट (यूपीपीसीएल मीडिया)

उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था को आधुनिक बनाने के नाम पर लगाए जा रहे स्मार्ट प्रीपेड मीटर अब सवालों के घेरे में आ गए हैं। उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) भले ही इसे पारदर्शिता और तकनीकी सुधार की दिशा में बड़ा कदम बता रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना को लेकर नई बहस छिड़ गई है। उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) द्वारा इसे पारदर्शिता और आधुनिक तकनीक का बड़ा कदम बताया जा रहा है, लेकिन सूत्रों के हवाले से कई अहम पहलुओं पर सवाल उठने लगे हैं।

⚡ क्या कहता है विभाग?

पावर कॉर्पोरेशन का दावा है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर आधुनिक तकनीक से लैस हैं, जिनमें GPRS/आरएफ आधारित संचार प्रणाली लगी होती है। यह मीटर उपभोक्ता की बिजली खपत का डेटा सीधे कंट्रोल रूम तक भेजते हैं, जिससे मीटर रीडिंग की प्रक्रिया पूरी तरह ऑटोमेटिक हो जाती है। विभाग का दावा है कि इससे उपभोक्ताओं को रीयल-टाइम जानकारी, सटीक बिलिंग और मानवीय त्रुटियों से राहत मिलती है।

पावर कॉर्पोरेशन यह भी कह रहा है कि यह प्रणाली मोबाइल के प्रीपेड मॉडल की तरह काम करती है, जिसमें पहले रिचार्ज कर बिजली का उपयोग किया जाता है। साथ ही, बैलेंस बनाए रखने पर 2 प्रतिशत तक की छूट और मोबाइल अलर्ट जैसी सुविधाएं भी दी जा रही हैं।

इसके अलावा विभाग यह भी कहता है कि:

  • उपभोक्ता को रीयल-टाइम खपत की जानकारी मिलती है
  • मोबाइल की तरह पहले रिचार्ज, फिर उपयोग की सुविधा
  • बैलेंस पॉजिटिव रखने पर 2% तक छूट
  • SMS अलर्ट और घर बैठे रिचार्ज
  • मीटर खराब होने पर ऑटोमेटिक सूचना

📉 लेकिन आंकड़े खोल रहे पोल

हालांकि, आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। प्रदेश में करीब 85 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं, जिनमें 78 लाख प्रीपेड उपभोक्ता शामिल हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि यूपीपीसीएल के लाखों प्रचार-प्रसार के बावजूद सिर्फ 10 लाख के आसपास उपभोक्ताओं ने ही स्मार्ट ऐप डाउनलोड किया है।

लेकिन सूत्रों का कहना है कि सिर्फ करीब 10 लाख उपभोक्ताओं ने ही UPPCL Smart App डाउनलोड किया है।

📱 ऐप पर उठे गंभीर सवाल

विभाग लगातार उपभोक्ताओं को UPPCL Smart App डाउनलोड करने के लिए प्रेरित कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस ऐप से जुड़े आर्थिक पहलू भी चर्चा में हैं। बताया जा रहा है कि ऐप डाउनलोड और रिचार्ज व्यवस्था के माध्यम से Jio Platforms Limited को निश्चित भुगतान और कमीशन मिलता है। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक स्तर पर कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं की गई है।

लेकिन सूत्रों के अनुसार, इस ऐप के हर डाउनलोड पर Jio Platforms Limited को करीब ₹60 प्रति यूजर दिया जाता है, साथ ही रिचार्ज पर 0.5% से 2% तक कमीशन भी मिलता है।

यही नहीं, सवाल यह भी उठ रहा है कि:
👉 जब उपभोक्ता ऐप ही नहीं डाउनलोड कर रहे, तो फिर इतना दबाव क्यों?
👉 क्या यह डिजिटल सुविधा है या किसी निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने की योजना?

⚠️ “आपदा में अवसर” या सुनियोजित खेल?

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि उपभोक्ताओं की भागीदारी कम रहती है, तो इस योजना की प्रभावशीलता पर असर पड़ सकता है। वहीं, कुछ विशेषज्ञ इसे डिजिटल ट्रांजिशन का हिस्सा बताते हुए समय के साथ सुधार की संभावना भी जता रहे हैं।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि बिना किसी औपचारिक निजीकरण के, ऐप और डिजिटल सेवाओं के माध्यम से निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाना एक “परोक्ष निजीकरण” की ओर इशारा करता है।

फिलहाल, स्मार्ट मीटर योजना को लेकर दावे और सवाल दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह व्यवस्था उपभोक्ताओं के लिए कितनी लाभकारी साबित होती है।

यह पूरा मामला अब सवाल खड़ा कर रहा है कि:
➡️ क्या स्मार्ट मीटर योजना वाकई उपभोक्ता हित में है?
➡️ या फिर इसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक खेल छिपा हुआ है?

🧾 जहां एक तरफ सरकार और बिजली विभाग स्मार्ट मीटर को भविष्य की तकनीक बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ताओं की उदासीनता और ऐप से जुड़े आर्थिक पहलू इस पूरे मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

अब देखना यह होगा कि यह “स्मार्ट” योजना वाकई पारदर्शिता लाती है या फिर विवादों में उलझकर रह जाती है।

समाचार (सूत्रों के हवाले से)

AZMI DESK

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