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लखनऊ में ‘वर्टिकल’ के नाम पर नया खेल?

कलेक्शन विंग कर रहा तकनीकी दखल — जिम्मेदारी किसकी?

मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड द्वारा लखनऊ में लागू वर्टिकल व्यवस्था के बीच गोमती नगर जोन से चौंकाने वाली जानकारियां सामने आ रही हैं। पूरी खबर सूत्रों के हवाले से

सूत्र बताते हैं कि गोमती नगर जोन में अधीक्षण अभियंता (वाणिज्य) की मौन सहमति से अधिशासी अभियंता (कलेक्शन) द्वारा तकनीकी प्रकृति के कार्य कराए जा रहे हैं। इनमें लोड एक्सटेंशन/लोड आवंटन और लाइन ऊर्जीकृत कराने जैसे कार्य शामिल बताए जा रहे हैं।

सूत्रों का दावा है कि इन प्रक्रियाओं में तकनीकी शाखा अथवा तथाकथित “तकनीकी बैंक” को पूर्ण रूप से विश्वास में नहीं लिया गया। यदि यह सही है, तो वर्टिकल व्यवस्था के मूल सिद्धांत—कार्य विभाजन और जवाबदेही—पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।वर्टिकल व्यवस्था का मूल सिद्धांत ही था— वाणिज्य और तकनीकी का स्पष्ट पृथक्करण, ताकि जवाबदेही तय हो सके। यदि कलेक्शन विंग तकनीकी कार्यों में हस्तक्षेप करेगा, तो फिर वर्टिकल व्यवस्था का औचित्य क्या रह जाएगा?

मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड द्वारा राजधानी लखनऊ को वर्टिकल व्यवस्था में ढालने के बाद सिस्टम को पारदर्शी, जवाबदेह और तकनीकी रूप से सुदृढ़ बनाने का दावा किया गया था। लेकिन गोमती नगर जोन से जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।

अफवाह या साजिश?- निदेशक वाणिज्य का नाम क्यों?

सूत्रों के अनुसार जोन स्तर पर यह प्रचारित किया जा रहा है कि उक्त कार्य निदेशक (वाणिज्य) योगेश कुमार के निर्देशों पर हो रहे हैं।

हालांकि, यूपीपीसीएल मीडिया को मिले इनपुट के मुताबिक इस संबंध में कोई स्पष्ट लिखित आदेश उपलब्ध नहीं बताया जा रहा। सूत्रों की मानें तो उच्च अधिकारी का नाम लेकर कार्यों को वैध ठहराने की कोशिश की जा रही है।

यह भी चर्चा है कि यदि आदेश लिखित रूप में मौजूद नहीं हैं, तो किसी वरिष्ठ अधिकारी का नाम उछालना प्रशासनिक मर्यादा के विरुद्ध माना जा सकता है। क्या किसी उच्च अधिकारी का नाम लेकर अपनी प्रशासनिक मनमानी को वैध ठहराने की कोशिश हो रही है? क्या यह निदेशक वाणिज्य को बदनाम करने की सुनियोजित रणनीति है?

मुख्य अभियंता की भूमिका पर सवाल

सूत्रों के हवाले से यह भी सामने आया है कि गोमती नगर जोन के मुख्य अभियंता को इन कार्यों की विस्तृत जानकारी नहीं है।

यदि तकनीकी कार्य बिना शीर्ष तकनीकी निगरानी के कराए जा रहे हैं, तो यह न केवल प्रक्रिया संबंधी चूक है, बल्कि भविष्य में जवाबदेही तय करने में भी जटिलता पैदा कर सकता है।

वर्टिकल व्यवस्था पर असर

वर्टिकल मॉडल लागू करने का उद्देश्य ही था—

  • वाणिज्य और तकनीकी शाखाओं का स्पष्ट पृथक्करण
  • अधिकार क्षेत्र की परिभाषा
  • जवाबदेही सुनिश्चित करना

लेकिन सूत्रों के अनुसार यदि कलेक्शन विंग तकनीकी कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है, तो यह व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत माना जा सकता है।

अधीक्षण अभियंता–वाणिज्य से सीधा सवाल

  1. क्या कलेक्शन विंग को तकनीकी कार्यों की अनुमति देने का अधिकार नियम पुस्तिका में है?
  2. यदि नहीं, तो यह आदेश किस आधार पर जारी हुए?
  3. निदेशक वाणिज्य का नाम क्यों और किस दस्तावेज़ के आधार पर लिया जा रहा है?
  4. क्या यह स्वीकार किया जाएगा कि वर्टिकल व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं?

वर्टिकल या ‘मर्ज्ड’ अव्यवस्था?

वर्टिकल व्यवस्था लागू करते समय उपभोक्ताओं को बताया गया था कि अब प्रक्रिया स्पष्ट होगी, कार्यक्षेत्र निर्धारित होगा और भ्रष्टाचार/मनमानी पर रोक लगेगी। लेकिन यदि वाणिज्य शाखा तकनीकी फैसले लेने लगे और तकनीकी शाखा को जानकारी तक न हो, तो यह व्यवस्था वर्टिकल नहीं, ‘कंफ्यूज्ड हाइब्रिड’ बन जाती है।

यूपीपीसीएल मीडिया का स्पष्ट मत

यदि किसी अधिकारी द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर तकनीकी निर्णय लिए जा रहे हैं और वरिष्ठ अधिकारियों के नाम का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो यह न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि विभागीय अनुशासन के लिए भी गंभीर खतरा है।

बड़ा सवाल

  • क्या इन कार्यों के संबंध में कोई विधिवत आदेश मौजूद है?
  • यदि नहीं, तो जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी?
  • क्या निदेशक वाणिज्य का नाम अनावश्यक रूप से लिया जा रहा है?
  • और क्या मुख्य अभियंता इस प्रकरण पर संज्ञान लेंगे?

यह स्पष्ट है कि फिलहाल पूरा मामला सूत्रों के हवाले से सामने आया है, और आधिकारिक पुष्टि की प्रतीक्षा है। यदि आरोपों में तथ्य हैं, तो यह वर्टिकल व्यवस्था के क्रियान्वयन पर गंभीर पुनर्विचार की मांग करेगा।

— UPPCL MEDIA (सूत्र आधारित रिपोर्ट)

AZMI DESK

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