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हर साल वही कहानी: “लोड बढ़ा”… या विभाग सोता रहा?

पुराने ट्रांसफॉर्मर, दोगुना कनेक्शन और बार-बार रिपेयर — अंधेरे की सरकारी तैयारी

लखनऊ/ग्रामीण उत्तर प्रदेश | UPPCL MEDIA विशेष रिपोर्ट

प्रदेश में गर्मी शुरू होने से पहले ही बिजली व्यवस्था की असलियत सामने आने लगी है। गांव हो या कस्बा — ट्रांसफॉर्मर फुंकना अब दुर्घटना नहीं, बल्कि तयशुदा प्रक्रिया बन चुकी है। और हैरानी की बात यह कि विभाग इसे हर बार “अचानक बढ़े लोड” का नाम देकर पल्ला झाड़ लेता है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) हर साल गर्मियों में एक ही रटा-रटाया बयान देता है — “लोड अधिक होने से ट्रांसफॉर्मर क्षतिग्रस्त हो गए”…. लेकिन सवाल है… लोड अचानक बढ़ता है या विभाग की लापरवाही वर्षों से चल रही है?

⚡ छोटे ट्रांसफॉर्मर, बड़ा बोझ-

🧯 खरीद बंद, उपयोग चालू — 10-16 KVA पर पूरा गांव

प्रदेश के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी 10 KVA, 16 KVA, 25 KVA और 63 KVA के वितरण परिवर्तक बड़ी संख्या में लगे हैं।

सूत्र बताते हैं —

  • 10 KVA और 16 KVA ट्रांसफॉर्मर की खरीद 2014-15 से बंद
  • वही पुराने ट्रांसफॉर्मर आज भी चालू
  • कई 8-10 बार नहीं… 15 बार तक रिपेयर

👉 मतलब — आधी क्षमता का ट्रांसफॉर्मर
👉 लेकिन कनेक्शन — दोगुने

परिणाम: गर्मी आते ही गांव अंधेरे में

सूत्रों के अनुसार 10 KVA और 16 KVA क्षमता के वितरण ट्रांसफॉर्मर की खरीद वर्ष 2014-15 से बंद है, लेकिन आज भी यही ट्रांसफॉर्मर हजारों गांवों की बिजली ढो रहे हैं। स्थिति यह है कि —

  • कई ट्रांसफॉर्मर 8-10 नहीं बल्कि 15 बार तक रिपेयर हो चुके
  • क्षमता आधी से भी कम रह गई
  • कनेक्शन संख्या क्षमता से लगभग दोगुनी

यानी बूढ़े ट्रांसफॉर्मर पर जवान लोड। नतीजा: जैसे ही तापमान बढ़ता है — ट्रांसफॉर्मर धड़ाधड़ जलना शुरू।

🔧 “रिपेयर उद्योग” बनाम बिजली व्यवस्था

विभागीय नियम कहते हैं —
बार-बार खराब होने वाले परिवर्तक को Uneconomical घोषित कर बदलना चाहिए।

लेकिन जमीनी हकीकत:

  • ट्रांसफॉर्मर जलता है
  • वर्कशॉप जाता है
  • फिर वही वापस लग जाता है

फिर जलता है… फिर रिपेयर… फिर खर्च…

👉 जनता परेशान
👉 विभाग का पैसा बर्बाद
👉 जिम्मेदार सुरक्षित

🔧 Uneconomical घोषित क्यों नहीं?

विभागीय नियम साफ कहते हैं —
बार-बार खराब होने वाले ट्रांसफॉर्मर को Uneconomical घोषित कर बदला जाए

लेकिन जमीनी सच्चाई:
उसे बदलने के बजाय वर्कशॉप भेजो, कॉयल बदलो, तेल भरो… फिर खंभे पर टांग दो।

कुछ दिनों बाद फिर जलेगा — फिर रिपेयर।

यानी बिजली व्यवस्था नहीं, “रिपेयर व्यवस्था” चल रही है।

इस चक्कर में

  • सरकारी धन की बर्बादी
  • उपभोक्ताओं की परेशानी
    दोनों जारी।

🏙 शहरों में भी हाल बेहाल- शहर भी सुरक्षित नहीं

समस्या सिर्फ गांव तक सीमित नहीं।

160 KVA से 1000 KVA के मीडियम पावर ट्रांसफॉर्मर:

  • 10–15 बार तक जल चुके
  • क्षमता आधी से भी कम
  • गर्मी में बार-बार फेल

फिर भी न बदले जाते हैं…
बस लाइनमैन और JE पर कार्रवाई की औपचारिकता।

समस्या सिर्फ ग्रामीण नहीं है।
शहरी और तहसील क्षेत्रों के 160 से 1000 KVA ट्रांसफॉर्मर भी कई-कई बार जल चुके हैं।

कई ऐसे परिवर्तक हैं जिनकी वास्तविक क्षमता आधी रह गई, और वही हर गर्मी में सबसे पहले फेल होते हैं।

फिर भी बदले नहीं जाते —
सिर्फ रिपोर्ट, नोटिस और कार्रवाई का कागज़ी खेल चलता है।

🧾 जिम्मेदारी कौन लेगा?

यदि नियम के अनुसार Uneconomical घोषित कर नए ट्रांसफॉर्मर लगाए जाएं तो:

✔ लाइन लॉस घटेगा
✔ ओवरलोडिंग रुकेगी
✔ बार-बार फाल्ट खत्म होंगे
✔ विभाग का करोड़ों रुपया बचेगा

लेकिन ऐसा करने में रुचि कम और
कार्रवाई दिखाने में रुचि ज्यादा दिखाई देती है।

📉 योजना विफल, जिम्मेदारी गायब

बिजली विभाग हर वर्ष लोड वृद्धि का अनुमान बनाता है, फिर भी:

  • पर्याप्त नए ट्रांसफॉर्मर नहीं खरीदे जाते
  • स्टोर खाली
  • ओवरलोडिंग जारी
  • लाइनमैन जिम्मेदार ठहराए जाते

बड़ा सवाल यही —
तकनीकी समस्या है या प्रशासनिक उदासीनता?

🟥 यूपीपीसीएल मीडिया का मानना है कि

ट्रांसफॉर्मर इसलिए नहीं जल रहे कि गर्मी ज्यादा है,
बल्कि इसलिए जल रहे हैं कि
उन्हें समय पर बदला ही नहीं जा रहा।

जब तक पुराने, बार-बार जले और कमजोर ट्रांसफॉर्मर हटाकर नए नहीं लगाए जाएंगे,
तब तक हर गर्मी में अंधेरा तय है —
और विभाग का बयान भी तय है।

“लोड बढ़ गया था…”

✍️ UPPCL MEDIA
बिजली व्यवस्था पर सीधी और सख्त नजर

AZMI DESK

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