Telangana Municipal Elections: तेलंगाना नगर पालिका चुनाव में व्हिप से बचते खुद BRS विधायकों ने बिगाड़ा खेल, गदवाल में ‘हाथ’ का साथ देकर चौंकाया

तेलंगाना के विभिन्न नगर निकायों में अध्यक्ष और महापौर चुनने की प्रक्रिया शुरू हुई तो भारत राष्ट्र समिति (BRS) के खेमे में सन्नाटा और बेचैनी साफ देखी जा सकती थी. नगर पालिकाओं पर दोबारा कब्जा जमाने का गुलाबी पार्टी का ख्वाब उस वक्त चकनाचूर होता दिखा, जब पार्टी अपने ही कई विधायकों को व्हिप जारी करने के लिए ढूंढ तक नहीं पाई. इस राजनीतिक ड्रामे का सबसे बड़ा केंद्र गदवाल बना, जहां बीआरएस के ही विधायकों ने अपनी पार्टी की रणनीति को धता बताते हुए कांग्रेस (INC) के उम्मीदवार पेरिका स्वाति को चेयरमैन की कुर्सी पर बिठा दिया. सत्ता के इस खेल में ‘एक्स-ऑफिशियो’ यानी पदेन सदस्यों के वोटों ने निर्णायक भूमिका निभाई, जिसने BRS के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया है.
दरअसल, नगर पालिकाओं में चेयरमैन चुनने के लिए विधायक, एमएलसी और सांसदों के वोट बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं. कानूनन, पार्टियों को अपने इन सदस्यों को व्हिप जारी करना होता है, जिसके लिए सदस्यों का खुद उपस्थित होना और उनके हस्ताक्षर लेना अनिवार्य है. बीआरएस के लिए संकट तब शुरू हुआ जब पार्टी उन विधायकों तक नहीं पहुंच पाई जो पिछले कुछ समय से कांग्रेस के संपर्क में बताए जा रहे थे. पार्टी के रणनीतिकार व्हिप की कॉपियां लेकर घूमते रहे, लेकिन कांग्रेस के करीबी माने जाने वाले इन विधायकों में से कोई भी व्हिप लेने के लिए उपलब्ध नहीं था. गडवाल में तो स्थिति और भी चौंकाने वाली रही, जहां बीआरएस विधायकों ने खुले आम कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन कर पार्टी अनुशासन की धज्जियां उड़ा दीं.
BRS के भीतर असंतोष की लहर
अगर अतीत के पन्नों को पलटें तो 2023 के विधानसभा चुनावों के बाद से ही BRS के भीतर असंतोष की लहर चल रही थी. हालिया निकाय चुनावों के नतीजों ने कई नगरपालिकाओं में त्रिशंकु स्थिति पैदा कर दी, जहां कांग्रेस, बीआरएस और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला था. ऐसी स्थिति में एक्स-ऑफिशियो वोट ही वह चाबी थी जिससे सत्ता का ताला खुलना था. कांग्रेस ने इस मौके का फायदा उठाते हुए बीआरएस के असंतुष्ट धड़े को अपनी ओर खींचने में सफलता पाई. गडवाल और उसके आसपास के इलाकों में यह पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि बीआरएस के कुछ बड़े चेहरे पाला बदल सकते हैं, और आज की घटना ने उन चर्चाओं पर मुहर लगा दी है.
तेलंगाना की शहरी राजनीति
तेलंगाना की शहरी राजनीति में अब कांग्रेस का पलड़ा भारी होता दिख रहा है. बीआरएस के लिए यह सिर्फ एक चुनावी हार नहीं बल्कि नेतृत्व और वफादारी के मोर्चे पर एक बड़ी नाकामी है. व्हिप से बचने की यह लुका-छिपी बताती है कि राज्य की राजनीति में सत्ता का केंद्र बदल चुका है और विधायकों की बदली वफादारी ने बीआरएस के मजबूत किलों को ढहा दिया है. शहरी निकायों पर नियंत्रण खोना केसीआर की पार्टी के लिए आने वाले समय में बड़ी संगठनात्मक चुनौती पेश कर सकता है.



