दिल्ली विधानसभा में विशेषाधिकार हनन का मामला, मंत्री कपिल मिश्रा ने स्पीकर को भेजी औपचारिक शिकायत

दिल्ली विधानसभा की कार्यवाही से जुड़े एक मामले ने तूल पकड़ लिया है. दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा ने विधानसभा अध्यक्ष को एक औपचारिक पत्र लिखकर विशेषाधिकार हनन का गंभीर आरोप लगाया है. मंत्री का कहना है कि पंजाब पुलिस द्वारा विधानसभा की कार्यवाही में हस्तक्षेप किया गया है, जो न केवल असंवैधानिक है बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं के भी खिलाफ है.
मंत्री कपिल मिश्रा ने अपनी शिकायत में बताया कि दिल्ली विधानसभा की कार्यवाही से जुड़े एक वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा करने के मामले में एफआईआर दर्ज की गई, जिसे वह एक विधायक को डराने और दबाव बनाने की कोशिश मानते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता इकबाल सिंह और पंजाब पुलिस के कुछ अधिकारियों ने मिलकर यह कदम उठाया है.
अनुच्छेद 361A और संवैधानिक सुरक्षा का तर्क
अपने पत्र में मंत्री कपिल मिश्रा ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 361A का विशेष रूप से उल्लेख किए जाने की बात कही है. इस अनुच्छेद के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि संसद या किसी राज्य विधानसभा की कार्यवाही की सही और तथ्यपरक रिपोर्टिंग करने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ न तो दीवानी और न ही आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है, जब तक यह साबित न हो जाए कि रिपोर्ट दुर्भावना से प्रकाशित की गई है. यानी यदि रिपोर्ट सच्ची है और गलत मंशा से नहीं की गई है, तो उसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है.
हालांकि, अनुच्छेद 361A यह भी साफ करता है कि यह सुरक्षा गुप्त बैठकों से जुड़ी रिपोर्टिंग पर लागू नहीं होती. लेकिन मंत्री का दावा है कि जिस वीडियो को लेकर कार्रवाई की गई, वह सामान्य विधानसभा कार्यवाही से संबंधित था, न कि किसी गुप्त सत्र से.
कार्यवाही के स्वरूप पर स्थिति स्पष्ट
मंत्री कपिल मिश्रा ने इस पूरे मामले को विधानसभा की गरिमा और अधिकारों पर हमला बताया है. उन्होंने मांग की है कि इस प्रकरण को विधानसभा की विशेषाधिकार समिति को भेजा जाए, ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो सके. साथ ही उन्होंने दोषी अधिकारियों और शिकायतकर्ता की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की अपील की है.
विशेषाधिकार समिति से जांच की मांग
गौरतलब है कि भारत में विधानसभा और संसद को विशेष अधिकार दिए गए हैं ताकि जनप्रतिनिधि बिना डर के जनता की बात उठा सकें. किसी बाहरी एजेंसी द्वारा विधानसभा की कार्यवाही से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप को हमेशा गंभीरता से देखा जाता है. इससे पहले भी देश के कई राज्यों में विधानसभा विशेषाधिकार से जुड़े विवाद सामने आते रहे हैं, जिन पर बाद में समितियों द्वारा जांच की गई.
विधायी अधिकारों और अभिव्यक्ति पर बहस
इस मामले ने एक बार फिर संवैधानिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सीमाओं पर बहस को तेज कर दिया है. अब सभी की नजरें विधानसभा अध्यक्ष के अगले कदम और विशेषाधिकार समिति के फैसले पर टिकी हैं.



