UGC के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच कल करेगी सुनवाई

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों के खिलाफ सामान्य वर्ग के युवाओं में नाराजगी है. इन्हें वापस करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिस पर शीर्ष अदालत सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच इस याचिका पर कल गुरुवार (29 जनवरी, 2026) को सुनवाई करेगी.
याचिका में कहा गया है कि नए नियम जातिगत भेदभाव दूर करने के नाम पर सामान्य वर्ग के छात्रों से भेदभाव करने वाले हैं. इनमें अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के साथ जातिगत भेदभाव की शिकायत की व्यवस्था की गई है, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों को छोड़ दिया गया है. झूठी शिकायत करने वाले पर किसी तरह की कार्रवाई की भी व्यवस्था इन नियमों में नहीं है.
क्या है UGC का नया समानता नियम?
UGC ने 15 जनवरी, 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन रेगुलेशंस, 2026 नियम को लागू कर दिया है. इस नियम को मुख्य उद्देश्य देश भर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकना और सभी छात्रों और कर्मचारियों को एक समान मौका देना बताया गया है. इस नियम की सबसे अहम विशेषता यह है कि अब अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है.
नए नियम के तहत प्रत्येक हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट को एक समान अवसर केंद्र बनाना होगा. इंस्टीट्यूट में भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के निपटारे के लिए विशेष समितियां गठित करनी होगी और 24 घंटे की हेल्पलाइन सेवा भी शुरू करनी होगी. इसके अलावा, नियम के मुताबिक, एक तय समयसीमा में नियम के तहत दाखिल की गई शिकायतों पर कार्रवाई भी करनी होगी.
UGC के नए नियम का क्यों हो रहा विरोध?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के इस नियम के लागू होते ही देश के कई हिस्सों में सवर्ण जातियों से जुड़े संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है. छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि यह नियम सभी वर्गों के लिए संतुलित नहीं है और इसका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है. इस नियम को लेकर सबसे बड़ा डर यह है कि झूठे भेदभाव के आरोप लगाकर छात्रों और शिक्षकों को फंसाया भी जा सकता है.
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