नोएडा इंजीनियर की मौत मामला: कोर्ट ने बिल्डर कर्मचारियों की हिरासत बढ़ाई, जांच अधिकारी को फटकार

नोएडा सेक्टर-150 के पास बेसमेंट निर्माण के लिए खोदे गए गहरे गड्ढे में डूबकर सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के मामले में मंगलवार को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने लोटस ग्रीन बिल्डर से जुड़े आरोपी रवि बंसल और सचिन करनवाल की न्यायिक हिरासत 29 जनवरी तक बढ़ा दी. जबकि एमजेड विजटाउन बिल्डर कंपनी के निदेशक अभय कुमार की न्यायिक हिरासत दो फरवरी तक बढ़ाई.
सहायक शासकीय अधिवक्ता संजीव त्रिपाठी ने बताया कि सुनवाई दोपहर करीब तीन बजे शुरू हुई. लोटस ग्रीन की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने दलील दी कि गिरफ्तार दोनों आरोपी कंपनी के निदेशक या निर्णय लेने वाले अधिकारी नहीं हैं, बल्कि वेतनभोगी कर्मचारी हैं. उनका कहना था कि बिना पूरी जांच के प्रशासनिक और पुलिस दबाव में गिरफ्तारी की गई और उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देंशों का पालन नहीं हुआ.
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि कंपनी की ओर से लगभग 500 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है, जिसमें घटनास्थल से संबंधित तकनीकी विवरण, जीपीएस युक्त सैटेलाइट इमेज और पुराने रिकॉर्ड शामिल हैं.
2021 से जलभराव की स्थिति बनी हुई है
अधिवक्ताओं के अनुसार वर्ष 2021 में नाले के क्षतिग्रस्त होने के बाद से वहां जलभराव की स्थिति बनी हुई थी, जिसकी सूचना नोएडा प्राधिकरण को दी गई थी और मरम्मत के लिए फंड भी स्वीकृत हुआ था, लेकिन काम नहीं कराया गया. ऐसे में जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर डालना अनुचित है.
बहस के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पुलिस ने आरोपियों की भूमिका का स्पष्ट आकलन नहीं किया और न ही यह बताया कि उन्हें किस आधार पर जेल भेजा गया. बड़े बिल्डर और शीर्ष पदों पर बैठे लोग अब भी गिरफ्तारी से बाहर हैं, जबकि निचले स्तर के कर्मचारियों को आरोपी बनाया गया है. इस आधार पर नियमित जमानत की मांग की गई.
500 पेज की रिपोर्ट नहीं पढ़ पाए जांच अधिकारी, कोर्ट की फटकार
सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच अधिकारी से 500 पन्नों की रिपोर्ट के अध्ययन के बारे में पूछा. जांच अधिकारी ने कहा कि रिपोर्ट काफी बड़ी होने के कारण उसे पूरी तरह पढ़ने के लिए समय नहीं मिल सका और कुछ और दिन चाहिए, इस पर अदालत असंतुष्ट दिखी.
सीजेएम ने कहा कि पिछली सुनवाई में भी जांच अधिकारी को पूरी तैयारी के साथ आने का निर्देश दिया गया था, इसके बावजूद रिपोर्ट का अध्ययन नहीं किया गया. अदालत ने इसे गंभीर लापरवाही बताते हुए विवेचक को कड़ी फटकार लगाई.



