नाशिक लॉन्ग मार्च: 5वें दिन कसारा पहुंचा हजारों किसानों का मोर्चा, 3 फरवरी को मुंबई में दिखाएंगे ताकत

अपनी विभिन्न लंबित मांगों को लेकर नाशिक जिले के आदिवासी इलाकों से शुरू हुआ ‘किसान लॉन्ग मार्च’ आज पांचवें दिन घाटनदेवी-कसारा गांव तक पहुंच गया है. अखिल भारतीय किसान सभा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व में निकाले गए इस मार्च में हजारों की संख्या में आदिवासी महिला-पुरुष और किसान अपने राशन-पानी के साथ शामिल हैं.
मोर्चे का नेतृत्व कर रहे पूर्व विधायक कॉमरेड जे. पी. गावित ने दोटूक शब्दों में कहा है कि यह आंदोलन अब रुकने वाला नहीं है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने स्थानीय स्तर पर मांगों का क्रियान्वयन शुरू नहीं किया, तो 3 फरवरी को यह विशाल मोर्चा मुंबई पहुँचकर अपनी ताकत दिखाएगा. आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रशासन केवल आश्वासन देता है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थितियाँ वैसी ही बनी हुई हैं.
प्रमुख मांगें: वन भूमि, पानी और शिक्षा पर जोर
इस लॉन्ग मार्च के माध्यम से आदिवासी समुदाय अपनी बुनियादी और हक की लड़ाई लड़ रहा है. उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
वन भूमि का अधिकार: वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत आदिवासियों के कब्जे वाली 10 एकड़ जमीन का पट्टा तुरंत दिया जाए. साथ ही, पति-पत्नी दोनों के नाम पर ‘सातबारा’ (भूमि रिकॉर्ड) दर्ज किया जाए.
नदियों का पानी: पश्चिमी वाहिनी नदियों के पानी को बहकर समुद्र में जाने से रोका जाए. जे.पी. सीमेंट कंक्रीट के आदर्श बांध बनाकर यह पानी स्थानीय किसानों, खान्देश और मराठवाड़ा के कृषि व उद्योगों के लिए मोड़ा जाए.
MSP और बोनस: सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी दी जाए. धान की फसल के लिए दिए जा रहे 40 हजार रुपये प्रति दो हेक्टेयर के बोनस का लाभ वन पट्टाधारकों को भी मिले.
शिक्षा और भर्ती: पेसा (PESA) क्षेत्रों में खाली पड़े सरकारी पदों पर तत्काल भर्ती की जाए. बदहाल आश्रम शालाओं और जिला परिषद स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति कर गिरते शैक्षणिक स्तर को सुधारा जाए.
कठिन परिस्थितियों में जारी है संघर्ष
तपती धूप और लंबी दूरी के बावजूद, मोर्चे में शामिल किसान और आदिवासी भाई-बहन अपने पारंपरिक वाद्ययंत्रों और नारों के साथ आगे बढ़ रहे हैं. किसानों की मांग है कि उन्हें खेती के लिए 24 घंटे बिजली आपूर्ति की जाए और वन पट्टाधारकों को कुआं, सोलर पंप और फल बागवानी जैसी सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिले.
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस सरकारी आदेश (GR) जारी नहीं होता, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा.



