मंच पर फिर साथ दिखे दोनों भाई, राज ठाकरे बोले, ‘जब मैंने शिवसेना छोड़ी थी तब…’

शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की जन्म शताब्दी के मौके पर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक बार फिर शुक्रवार (23 जनवरी) को एक मंच पर दिखे. राज ठाकरे ने अपने संबोधन में कहा कि उनके लिए शिवसेना (अविभाजित) छोड़ना आसान नहीं था. उन्होंने कहा कि ये पार्टी छोड़ना नहीं था, बल्कि घर छोड़ने जैसा था. अब उसे 20 साल हो चुके हैं. कुछ बातें मुझे समझ में आईं और कुछ बातें उद्धव को समझ में आईं.
‘उनके जैसा कलाकार कोई दूसरा पैदा नहीं हुआ’
मुंबई के सायन में षण्मुखानंद सभागृह में राज ठाकरे ने कहा, “आज बालासाहेब के बारे में बोलूं तो मैं और उद्धव घंटों-घंटों बातें कर सकते हैं. जब वो व्यंग्यचित्र बनाते थे, तब जो तल्लीनता (समाधि जैसी अवस्था) उसमें होती थी, मैंने वह देखी है. वे सिर्फ व्यंग्यचित्र नहीं होते थे, वे ध्यान-साधना जैसे होते थे. बाहर आंदोलन और दंगे चल रहे होते थे लेकिन वे पूरी तरह तल्लीन रहते थे. यह क्षमता उन्हें कहां से मिलती थी? वे देश के राजनेताओं में एक अलग ही इंसान थे. दुनिया में उनके जैसा कलाकार कोई दूसरा पैदा नहीं हुआ.”
कल्याण-डोंबिवली का जिक्र कर क्या बोले?
इसके आगे उन्होंने कहा, “उनके बारे में बाहर कुछ भी चलता रहे, वे अपनी कला में लगे रहते थे. आज राज्य में राजनीति में गुलामों का बाज़ार लग गया है. बालासाहेब अब नहीं हैं, यह अच्छा ही है, क्योंकि अगर वे होते तो बहुत व्यथित होते. महाराष्ट्र में इंसानों की नीलामी शुरू हो गई है. चाहे कल्याण-डोंबिवली हो या दूसरे ज़िले. यह सब देखकर हम व्यथित हो जाते हैं. कई लोग आज दूसरे दलों में दिखाई देते हैं, जिन्हें बालासाहेब ठाकरे ने ही बनाया था.”
‘कुछ बातें उद्धव ने छोड़ दीं, कुछ मैंने’
राज ठाकरे ने कहा, “जब मैंने शिवसेना छोड़ी थी, तब हालात अलग थे. कुछ बातें उद्धव ने छोड़ दीं और कुछ बातें मैंने भी छोड़ दीं. सुबह साफ हो जाए तो बेहतर होता है, बजाय इसके कि मन में कुंठा लेकर बैठे रहें. बालासाहेब ठाकरे पर व्याख्यान देना मुझे अच्छा लगेगा. हम घर में रहते हुए भी उस इंसान को पूरी तरह समझ नहीं पाए.”



