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बंगाल-तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनाव, वन नेशन-वन इलेक्शन… BJP अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के सामने ये 5 चुनौती

20 जनवरी 2026 को बीजेपी ने 45 साल के नितिन नवीन को अपना 12वां राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया है. वे पटना पश्चिम से पांच बार विधायक चुने गए हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी हैं. लेकिन उनके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं, जैसे आगामी चुनाव, परिसीमन, महिला आरक्षण और संगठन को मजबूत करना. नितिन नवीन सबसे युवा अध्यक्ष हैं, जबकि विपक्षी नेता जैसे मल्लिकार्जुन खरगे (83), लालू यादव (77), नीतीश कुमार (74), ममता बनर्जी (71), मायावती (70), केजरीवाल (57), अखिलेश यादव (52) उम्रदराज हैं.

इस कारण नितिन नवीन के सामने 5 बड़ी चुनौतियां हैं…

चुनौती 1: 2026 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव

नितिन नवीन के सामने सबसे तत्काल चुनौती 2026 में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, पुदुचेरी और केरल के विधानसभा चुनाव हैं. इन राज्यों में बीजेपी की जीत आसान नहीं है. पश्चिम बंगाल में सत्ता की चाहत है, असम में वापसी, तमिलनाडु और केरल में बेहतर प्रदर्शन, पुदुचेरी में वापसी. मुख्य चुनौती 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी तैयार करना है, जो परिसीमन के दौरान होंगे.

चुनौती 2: परिसीमन और सीट बंटवारे में उत्तर-दक्षिण तालमेल

2029 चुनाव परिसीमन प्रक्रिया के दौरान होंगे. नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटों का आरक्षण लागू होगा, जो जनगणना के बाद परिसीमन के साथ होगा. सरकार ने जनगणना की अधिसूचना जारी की है, जो 1 मार्च 2027 तक पूरी होगी. मोदी सरकार का लक्ष्य 2029 में महिला आरक्षण लागू करना है. सीट बंटवारे पर उत्तर और दक्षिण भारत में तालमेल बिठाना बड़ी चुनौती है.

चुनौती 3: महिला आरक्षण के लिए रणनीति बनाना

महिला आरक्षण लागू होने से 33% महिला उम्मीदवारों का चयन करना होगा. नितिन नवीन को इसके लिए रणनीति बनानी होगी, जो संगठन और चुनावी तैयारी को प्रभावित करेगी.

चुनौती 4: एक राष्ट्र, एक चुनाव पर सहमति बनाना

एक राष्ट्र एक चुनाव के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक सहमति तैयार करना नितिन नवीन की चुनौती है. यह बड़ा बदलाव है, जो पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकता है लेकिन विरोधी दलों से टकराव बढ़ाएगा.

चुनौती 5: नेतृत्व, संगठन और वैश्विक बदलाव

2029 तक नरेंद्र मोदी की उम्र 80 साल के करीब होगी, इसलिए मोदी के बाद का नेतृत्व तय करना बड़ी चुनौती है. अमित शाह नंबर दो हैं, लेकिन उनके फैसले पर सभी की सहमति बनानी होगी. योगी आदित्यनाथ भी संभावना हैं, लेकिन संगठन में पकड़ कम है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि मोदी के बाद शाह बनाम योगी की स्थिति बन सकती है. नितिन नवीन शाह की पसंद हैं, लेकिन योगी के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं. बीजेपी में शीर्ष के बाद नीचे का नेतृत्व कमजोर है.

संगठन स्तर पर चुनौती है कि बीजेपी अब आलाकमान की पार्टी है, जहां शक्ति केंद्रीकृत है. नितिन नवीन को आलाकमान के फैसले और संगठन अनुशासन के बीच संतुलन बनाना होगा. दक्षिण भारत में संगठन मजबूत करना मुश्किल है.

इसके अलावा बीजेपी को भारत की भाषाई और सांस्कृतिक बहुलता जोड़नी है. दक्षिण और पूर्व में समस्या है, जहां मजबूत क्षेत्रीय और जाति आधारित पार्टियां हैं. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में निपटना मुश्किल है.

बीजेपी में संघ से ताल्लुक मायने नहीं रखता

नितिन का चयन इसलिए हुआ क्योंकि वे अमित शाह और नरेंद्र मोदी के करीबी हैं. बीजेपी में आम कार्यकर्ता भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि फैसले मोदी और शाह की इच्छा से होते हैं. वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने बीबीसी को बताया कि नितिन नवीन ने राष्ट्रीय और बिहार स्तर पर क्षमता नहीं दिखाई, लेकिन वे संघ और बीजेपी दोनों में स्वीकार्य हैं. RSS की असहमति नहीं थी, जो अध्यक्ष चुनने में महत्वपूर्ण है. 2005 में लालकृष्ण आडवाणी को RSS के दबाव में इस्तीफा देना पड़ा था. नितिन नवीन संघ से जुड़े नहीं है, लेकिन 2014 के बाद बीजेपी में यह चीज मायने नहीं रखती. बीजेपी अब मजबूत है, जिसमें 240 लोकसभा सीटें, 21 राज्यों में सरकार और राज्यसभा में 99 सांसद हैं.

AZMI DESK

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