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उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था इस समय तकनीकी संकट से नहीं, बल्कि नीतिगत असंतुलन, प्रबंधन की कठोरता और जमीनी हकीकत से कटे फैसलों के कारण चरमराने की स्थिति में पहुंच गई है। एक तरफ हजारों संविदा कर्मियों को हटाया जा रहा है, दूसरी तरफ अभियंताओं पर निलंबन की तलवार लटक रही है, और तीसरी तरफ उपभोक्ताओं पर स्मार्ट मीटर और बढ़े हुए बिल का बोझ डाला जा रहा है।
पावर कॉरपोरेशन आज खुद ही अपने सिस्टम को ‘शॉर्ट सर्किट’ कर रहा है…
पूरी तस्वीर को देखें तो यह व्यवस्था किसी सुव्यवस्थित सिस्टम की नहीं, बल्कि एक ऐसे “परिवार” की लगती है जहाँ मुखिया सौतेले बाप की तरह व्यवहार कर रहा है—जो जिम्मेदारी से बचता है और दोष नीचे थोपता है।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था इस समय किसी एक समस्या से नहीं, बल्कि नीतिगत विसंगतियों, प्रबंधन की कठोर कार्यशैली और जमीनी हकीकत से कटे फैसलों के संयुक्त प्रभाव से जूझ रही है। हालात यह हैं कि जहाँ एक ओर हजारों संविदा कर्मियों को सेवा से बाहर किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अभियंताओं और जूनियर इंजीनियरों पर निलंबन की तलवार लटक रही है। इसी के साथ उपभोक्ताओं को स्मार्ट मीटर और बढ़े हुए बिलों के दबाव में रखा गया है।
कुल मिलाकर तस्वीर ऐसी बनती है, मानो पूरा विभाग एक ऐसे अभिभावक के अधीन हो, जो जिम्मेदारी निभाने के बजाय केवल नियंत्रण और दंड पर विश्वास करता हो—और इसी कारण यह उपमा स्वतः उभरती है कि “सौतेला बाप क्या जाने परिवार का हाल।”

सबसे पहले बात संविदा कर्मियों की। प्रदेशभर में लगभग 25,000 संविदा कर्मचारियों को हटाने की प्रक्रिया ने बिजली व्यवस्था की बुनियाद को ही हिला दिया है। लखनऊ के लेसा क्षेत्र में ही सैकड़ों ऑपरेटिंग स्टाफ को सेवा से बाहर कर दिया गया। यह वही लोग थे जो फील्ड में जाकर ट्रांसफार्मर बदलते थे, लाइन दुरुस्त करते थे और शिकायतों का वास्तविक समाधान करते थे।
🔴 25,000 संविदा कर्मी बाहर — सिस्टम की जड़ पर वार
प्रदेशभर में लगभग 25 हजार संविदा कर्मियों को हटाने की कार्रवाई ने बिजली व्यवस्था की नींव हिला दी है।
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लखनऊ (लेसा) में ही 340 ऑपरेटिंग स्टाफ हटाए गए
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यही कर्मचारी फील्ड में फॉल्ट सुधार और मेंटेनेंस का काम संभालते थे
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इनमें बड़ी संख्या उन परिवारों की है, जिन्हें विभाग ने दुर्घटना में मारे गए कर्मचारियों के बदले नौकरी देने का वादा किया था।
👉 अब वही परिवार बेरोजगार
👉 वादा बना “प्रशासनिक छल”
स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब यह सामने आता है कि इनमें बड़ी संख्या उन परिवारों की है जिन्हें विभाग ने कभी सहानुभूति के नाम पर नौकरी दी थी—उन कर्मचारियों के परिवार, जिन्होंने ड्यूटी के दौरान अपनी जान गंवाई थी। उस समय विभाग ने खुद को “परिवार” बताया था, लेकिन आज वही परिवार बेरोजगार कर दिए गए। यह सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि विश्वास के साथ किया गया सीधा विश्वासघात प्रतीत होता है।
इसके बाद बारी आती है अभियंताओं की ….
सूत्रों के अनुसार, बड़े पैमाने पर निलंबन की सूची तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। इसमें अधीक्षण अभियंता से लेकर जूनियर इंजीनियर तक शामिल हैं। आदेश की भाषा और प्रक्रिया इस ओर संकेत करती है कि यह कार्रवाई किसी विशिष्ट गलती के आधार पर नहीं, बल्कि एक “टारगेट” के रूप में की जा रही है।
⚡ इंजीनियरों पर ‘टारगेट सस्पेंशन’ — डर से चल रहा सिस्टम
सूत्रों के अनुसार:
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5 अधीक्षण अभियंता
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15 अधिशासी अभियंता
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और बड़ी संख्या में AE/JE
को निलंबित करने की सूची तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।
👉 यह कार्रवाई समस्या समाधान के लिए नहीं, बल्कि संख्या पूरी करने के लिए दिख रही है
👉 संदेश साफ: “जिम्मेदारी आपकी, चाहे गलती सिस्टम की हो”
ऐसे में स्वाभाविक है कि इंजीनियरों के बीच भय और असुरक्षा का माहौल बने। जो व्यक्ति सिस्टम को चलाने के लिए जिम्मेदार है, वही अगर हर समय दंड के डर में रहेगा, तो वह जोखिम लेकर निर्णय कैसे करेगा? और जब निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होगी, तो पूरी बिजली व्यवस्था का संतुलन बिगड़ना तय है।
इसी क्रम में ट्रांसफार्मर का मुद्दा एक गंभीर तकनीकी प्रश्न खड़ा करता है….
संलग्न पत्र में अनुरक्षण की जिम्मेदारी नीचे स्तर पर निर्धारित की गई है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि विभाग द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे ट्रांसफार्मर अधिकतर पुराने और जर्जर स्थिति में हैं। ऐसे उपकरण, जिनकी तकनीकी आयु लगभग समाप्त हो चुकी होती है, उन्हें फिर से उपयोग में लाया जा रहा है।
लोड बढ़ने पर ऐसे ट्रांसफार्मर का फुंकना लगभग निश्चित है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जब ऐसा होता है, तो जिम्मेदारी उपकरण की गुणवत्ता या आपूर्ति प्रणाली पर तय करने के बजाय सीधे फील्ड इंजीनियर पर डाल दी जाती है। उनसे रिकवरी की जाती है, और कई मामलों में निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई भी होती है।
🔧 ट्रांसफार्मर विवाद — पुराना सामान, नई सजा
संलग्न पत्र में अनुरक्षण की जिम्मेदारी नीचे तय की गई है, लेकिन जमीनी स्थिति अलग है:
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विभाग द्वारा दिए जा रहे ट्रांसफार्मर पुराने और जर्जर
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लोड बढ़ने पर ट्रांसफार्मर फुंकना तय
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मेंटेनेंस के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं
और जब ट्रांसफार्मर खराब होता है:
👉 इंजीनियर पर रिकवरी
👉 और कई बार निलंबन
सवाल:
👉 क्या ट्रांसफार्मर की कोई लाइफ साइकिल नहीं होती?
👉 अगर उपकरण पुराना है, तो दोष किसका?
यह तकनीकी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने का प्रशासनिक मॉडल बन गया है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है—
क्या ट्रांसफार्मर की कोई निर्धारित आयु नहीं होती?
यदि उपकरण पुराना है, तो उसके फेल होने की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए?
यह स्थिति एक तकनीकी समस्या से अधिक जवाबदेही से बचने की प्रशासनिक प्रवृत्ति को दर्शाती है।
उधर उपभोक्ता भी इस पूरे सिस्टम का सबसे कमजोर और सबसे अधिक प्रभावित पक्ष बन चुका है…
स्मार्ट मीटर, जिसे सुविधा और पारदर्शिता के नाम पर लागू किया गया था, अब व्यापक असंतोष का कारण बन गया है। उपभोक्ताओं की शिकायत है कि कम खपत के बावजूद बिल अधिक आ रहे हैं, रिचार्ज समाप्त होते ही तुरंत बिजली काट दी जाती है, और शिकायत करने पर कोई प्रभावी समाधान नहीं मिलता।
💡 स्मार्ट मीटर — सुविधा नहीं, ‘डिजिटल दबाव’
प्रदेश में लगभग 70 लाख उपभोक्ताओं पर स्मार्ट मीटर लागू किया गया।
जमीनी शिकायतें:
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कम खपत, ज्यादा बिल
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रिचार्ज खत्म = तुरंत बिजली कट
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शिकायत = कोई समाधान नहीं
अब जब अनिवार्यता हटने की बात सामने आई है, तो सवाल और गंभीर हो गया है:
👉 जब यह अनिवार्य नहीं था, तो इसे जबरन क्यों थोपा गया?
👉 किसके दबाव में निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया?
अब जब यह बात सामने आ रही है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर की अनिवार्यता को लेकर स्थिति बदली है, तो यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर इसे लागू क्यों किया गया। क्या यह निर्णय उपभोक्ता हित में था, या इसके पीछे कोई अन्य दबाव कार्य कर रहा था?
शिकायत निवारण प्रणाली की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। 1912 हेल्पलाइन, जो जनता के लिए राहत का माध्यम होनी चाहिए थी, अब केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है। कॉल का जवाब नहीं मिलता, समस्या का समाधान नहीं होता, लेकिन सिस्टम में शिकायत “निस्तारित” दिखा दी जाती है।
📞 1912 हेल्पलाइन — ‘समाधान का भ्रम’
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कॉल नहीं उठते
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शिकायत का निस्तारण नहीं
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लेकिन मैसेज आता है: “Resolved Successfully”
👉 जमीन पर समस्या जस की तस
👉 सिस्टम में सब “ठीक”
यह सेवा नहीं, आंकड़ों का खेल है।
यह एक ऐसा मॉडल बन गया है जिसमें वास्तविक समस्या को हल करने के बजाय उसका रिकॉर्ड बंद कर देना ही समाधान मान लिया गया है।
पूरी व्यवस्था को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि विभाग के तीनों प्रमुख स्तंभ …. कर्मचारी, इंजीनियर और उपभोक्ता—तीनों ही दबाव में हैं।
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कर्मचारी नौकरी खो रहे हैं
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इंजीनियर कार्रवाई के डर में हैं
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उपभोक्ता आर्थिक और सेवा संकट झेल रहा है
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह समस्या किसी एक स्तर की नहीं, बल्कि पूरे प्रबंधन ढांचे की है।
आने वाले समय में, विशेषकर गर्मी के मौसम में, जब बिजली की मांग अपने चरम पर होती है, तब इस तरह की कमजोर और असंतुलित व्यवस्था किस प्रकार टिकेगी—यह एक गंभीर चिंता का विषय है।
यदि फील्ड स्टाफ कम होगा, उपकरण पुराने होंगे और निर्णय लेने वाले अधिकारी जमीनी हकीकत से कटे होंगे, तो किसी भी प्रकार की बड़ी विफलता को टाल पाना मुश्किल होगा।
❄️ AC कमरों का प्रबंधन बनाम जमीन की हकीकत
ऊपर स्तर पर:
नीचे स्तर पर:
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कर्मचारी असुरक्षित
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इंजीनियर भय में
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उपभोक्ता परेशान
👉 यही है “सौतेला मॉडल” —
जहाँ आंकड़े चमकते हैं, और सिस्टम अंदर से टूटता है।
अंततः, यह पूरा परिदृश्य एक ही निष्कर्ष की ओर ले जाता है यह संकट बिजली का कम और प्रबंधन की सोच का अधिक है। जब जिम्मेदारी ऊपर तय नहीं होती और दंड नीचे दिया जाता है, जब सुविधा के नाम पर बोझ डाला जाता है, और जब समाधान के बजाय आंकड़े सजाए जाते हैं,
⚠️ जनता और कर्मचारी — दोनों में उबाल
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कर्मचारी संगठन खुलकर विरोध में
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इंजीनियरों में असंतोष
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उपभोक्ता सोशल मीडिया और सड़कों पर नाराज
👉 यह सिर्फ बिजली संकट नहीं, प्रबंधन पर भरोसे का संकट बन चुका है
🧾 निष्कर्ष: ‘शॉर्ट सर्किट’ सिस्टम का नहीं, सोच का है-
पावर कॉरपोरेशन आज खुद ही अपने सिस्टम को ‘शॉर्ट सर्किट’ कर रहा है।
👉 कर्मचारी हटाओ
👉 इंजीनियर डराओ
👉 जनता से वसूली करो
और नाम रख दो — ‘स्मार्ट मैनेजमेंट’।
आज स्थिति साफ है:
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कर्मचारी हटाए जा रहे
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इंजीनियरों को सजा दी जा रही
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उपभोक्ताओं पर बोझ डाला जा रहा
लेकिन:
👉 नीतिगत गलती स्वीकार नहीं
👉 जिम्मेदारी तय नहीं
तो ऐसी व्यवस्था को जनता और कर्मचारी दोनों एक ही नजर से देखते हैं—
“सौतेला बाप क्या जाने परिवार का हाल।”
✍🏻📌 विधिक सूचना / अस्वीकरण:
यह समाचार/विश्लेषण विभिन्न सार्वजनिक स्रोतों, कर्मचारी संगठनों द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्तियों, उपलब्ध दस्तावेजों एवं प्राप्त शिकायतों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। किसी भी व्यक्ति या पदाधिकारी की व्यक्तिगत छवि को ठेस पहुँचाना उद्देश्य नहीं है। यदि किसी पक्ष को इसमें उल्लिखित तथ्यों पर आपत्ति हो, तो वे अपना आधिकारिक पक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं, जिसे समान प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।



