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तेलंगाना में खत्म होने की ओर माओवाद! पोलित ब्यूरो सदस्य समेत चार बड़े नेताओं का आत्मसमर्पण

तेलंगाना में माओवादी आंदोलन का एक बड़ा अध्याय बंद होने के संकेत के साथ संगठन के चार शीर्ष नेताओं ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. इनमें संगठन के आधिकारिक प्रवक्ता और पोलित ब्यूरो सदस्य टिपिरी तिरुपति उर्फ देवूजी शामिल हैं, जो पिछले 44 साल से भूमिगत थे. 

इन नेताओं के आत्मसमर्पण के साथ ही तेलंगाना की माओवादी स्टेट कमेटी को अब खत्म माना जा रहा है, जो केंद्र और राज्य सरकार के लिए एक बड़ी सफलता है. यह घटना उस समय घटी है जब केंद्र सरकार ने मार्च 2026 तक देश से बाएं पंथी उग्रवाद (LWE) को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा है.

संगठन के मुख्य नेताओं ने किया आत्मसमर्पण

यह सिर्फ एक सामान्य आत्मसमर्पण नहीं है, बल्कि एक विचारधारा के पतन की दास्तां है. सबसे अहम नाम ‘अभय’ के उपनाम से सामने आने वाले देवूजी का है, जो माओवादी पार्टी के सबसे बड़े रणनीतिकार और चेहरा माने जाते थे. उनके साथ ही मल्ला राजी रेड्डी उर्फ संग्राम ने भी हथियार डाले हैं, जो 46 साल का लंबा अनुभव लेकर जंगल से बाहर आए हैं. दरअसल, दोनों ही नेता दशकों से संगठन की रीढ़ रहे हैं.  

इसके अलावा तेलंगाना के सैन्य अभियानों के प्रमुख बड़े चोक्का राव उर्फ दामोदर और पीएलजीए (PLGA) के सलाहकार नुने नरसिम्हा रेड्डी का भी आत्मसमर्पण संगठन के लिए बड़ा झटका है. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, इन चारों के सामने आने के बाद तेलंगाना स्टेट कमेटी अब विघटित हो चुकी है और राज्य में माओवादी नेतृत्व का कोई प्रभावी ढांचा नहीं बचा है.

इस बड़े बदलाव में तेलंगाना पुलिस की मुख्य भूमिका

इस बड़े बदलाव के पीछे तेलंगाना पुलिस की सख्त कार्रवाई और केंद्र सरकार की मंशा मुख्य है. पिछले कुछ सालों में सुरक्षाबलों ने जंगलों में इतना दबाव बनाया कि शीर्ष नेतृत्व के लिए सांस लेना भी मुश्किल हो गया था. सरकार ने आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास नीति और बेहतर जीवन का वादा किया, जिसका असर अब दिख रहा है.

यह भी माना जा रहा है कि नए रंगरूटों की कमी और पुराने नेताओं की बढ़ती उम्र ने भी उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया. दशकों पुरानी हिंसा और जंगलों में छिपे रहने की थकान ने इन कमांडर्स को मुख्यधारा में लौटने का रास्ता दिखाया है.

प्रशासन का मानना है कि इन शीर्ष नेताओं के आत्मसमर्पण से जंगलों में छिपे बाकी कार्यकर्ताओं पर भी असर पड़ेगा और वे भी हथियार डालने के लिए प्रेरित होंगे. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन वरिष्ठ नेताओं को कैसे पुनर्वासित करती है और तेलंगाना को पूरी तरह ‘माओवाद मुक्त’ करने की दिशा में यह कदम कितना कारगर साबित होता है.

AZMI DESK

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