बीजेपी ने 5 सालों में लिखी ‘ममता के बेदखली’ की स्क्रिप्ट! किन 5 मौकों पर चूकी TMC, सुवेंदु अधिकारी ने कैसे उखाड़ फेंकी सत्ता?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 एक बड़े भूचाल की तरह आया, जिसने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी TMC के 15 साल पुराने किले को ढहा दिया. एक ऐसी नेता जो कभी अपने दम पर वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंकने का दम रखती थीं. आज उनकी पार्टी महज 80 सीटों पर सिमट गई और वे खुद अपनी परंपरागत सीट भवानीपुर से चुनाव हार गईं. यह हार अचानक नहीं हुई, बल्कि पिछले कुछ सालों में हुई कई बड़ी घटनाओं और गहरी होती शासन विफलताओं का नतीजा थीं, जिन्होंने ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ को कमजोर कर दिया.
1. महिला सुरक्षा और आर.जी. कर कांड: वोट बैंक में बड़ी सेंध
ममता बनर्जी की चुनावी मजबूती का एक बड़ा आधार हमेशा महिला मतदाता रहे थे, जिन्हें वे ‘लक्ष्मीर भंडार’ जैसी योजनाओं से जोड़े रखने में कामयाब रहीं. लेकिन आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में एक महिला डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार और हत्या कांड ने इस पूरे समीकरण को बदलकर रख दिया. इस घटना ने न सिर्फ राज्य में महिला सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा की, बल्कि एक बड़े जनाक्रोश को जन्म दिया.
नागरिक समाज ने सड़कों पर उतरकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए. इसमें प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे. इस घटना ने ममता सरकार के लिए महिलाओं के बीच एक विश्वास का संकट खड़ा कर दिया. चुनावी नतीजों से साफ संकेत मिला कि महिलाओं की प्राथमिकता कल्याणकारी योजनाओं से हटकर अब अपनी सुरक्षा पर केंद्रित हो गई थी.
2. भ्रष्टाचार के कई कांड: पार्टी और सरकार के सिस्टम पर सवाल
ममता बनर्जी के 15 साल के शासनकाल में भ्रष्टाचार के इतने आरोप लगे कि यह उनकी सरकार की ‘पहचान’ बन गया, जिसे विपक्ष ने ‘भ्रष्टाचार उद्योग’ नाम दे दिया. शुरुआती दौर में सारदा चिट फंड घोटाले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन ने उनकी छवि को धक्का पहुंचाया, लेकिन इसके बाद तो शिक्षक भर्ती घोटाला (एस.एस.सी. घोटाला) सामने आया. इस घोटाले ने हजारों पढ़े-लिखे युवाओं के सपनों को तोड़ दिया, जिन्हें एग्जाम पास करने के बाद भी नौकरियां नहीं मिलीं.
सरेआम नकदी के बंडल बरामद होने से यह बात घर-घर तक पहुंच गई कि नौकरियां बिक रही हैं. इसके अलावा, राशन वितरण घोटाला, नगरपालिका भर्ती घोटाला, कोयला और मवेशी तस्करी के आरोपों ने भ्रष्टाचार को एक सिस्टम के रूप में स्थापित कर दिया. पार्टी के कई बड़े नेताओं और मंत्रियों की गिरफ्तारी ने आम जनता में यह धारणा पक्की कर दी कि सरकार पूरी तरह से भ्रष्ट है.
3. ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण के आरोप: सामाजिक ताने-बाने में दरार
ममता बनर्जी की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा अल्पसंख्यक समुदाय के कल्याण पर केंद्रित रहा, लेकिन धीरे-धीरे इसे ‘तुष्टिकरण’ के रूप में देखा जाने लगा. 2019 में उन्होंने बयान देते हुए कहा था कि वे ‘उस गाय की लात खाने को तैयार हैं जो दूध देती है’, ने आग में घी का काम किया और बीजेपी ने इसे खूब भुनाया. इसके बाद आसनसोल, मालदा, मुर्शिदाबाद और बशीरहाट जैसे जिलों में हुई सांप्रदायिक हिंसा और संदेशखाली जैसी घटनाओं ने हिंदू बहुल इलाकों में इस धारणा को और मजबूत किया कि प्रशासन सिर्फ एक तरफा कार्रवाई करता है.
2026 में ममता बनर्जी ने कहा था कि उनकी सरकार के बिना एक समुदाय ‘कुछ ही सेकंड में’ बहुसंख्यकों को बर्बाद कर सकता है. इस बयान ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया. नतीजतन बहुसंख्यक वोटों का भारी ध्रुवीकरण हुआ और TMC के लिए मुस्लिम वोटों में भी दरार आई.
4. शासन की विफलता और पलायन: बुनियादी मुद्दों पर खरी नहीं उतरी सरकार
विकास के मोर्चे पर ममता सरकार पूरी तरह विफल रही. राज्य में उद्योगों की कमी और ‘सिंडिकेट राज’ (बाहुबलियों और स्थानीय गुंडों का शासन) के चलते बड़े निवेशकों ने बंगाल से दूरी बना ली. इससे रोजगार के अवसर कम हुए और कुशल युवाओं का राज्य से बाहर पलायन बढ़ता गया. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति ने मध्यम वर्ग में गहरी नाराजगी पैदा की, जिसका असर चुनावों में साफ देखने को मिला. खासकर कोलकाता की सीटों पर जहां बीजेपी ने सफाया कर दिया.
इसके अलावा, लगातार 15 सालों की सत्ता से उपजी जबरदस्त एंटी-इन्कम्बेंसी ने जनता की नाराजगी को और हवा दी. पार्टी के भीतर की अंदरूनी कलह और कई बड़े नेताओं का बीजेपी में जाना भी संगठन के कमजोर होने की बड़ी वजह बना.
5. SIR ने तोड़ी कमर: 91 लाख वोटर्स खोने का बड़ा झटका
2026 के चुनाव से ठीक पहले, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से 91 लाख से अधिक नाम हटा दिए, जो कुल मतदाताओं का लगभग 12% था. इन हटाए गए नामों में बड़ी संख्या उन लोगों की बताई गई जो या तो मृत थे या राज्य से बाहर पलायन कर चुके थे, लेकिन TMC ने इसे ‘अवैध मतदाताओं’ यानी अल्पसंख्यक वोटरों को लक्षित करने वाला कदम बताया.
इस विवाद ने एक ऐसा माहौल बनाया जिसमें TMC के समर्थकों में भ्रम और अविश्वास फैला, जबकि बीजेपी के पक्ष में 93 प्रतिशत का रिकॉर्ड मतदान हुआ. मतदान प्रतिशत में यह जबरदस्त उछाल ही वह अंतिम झटका साबित हुआ, जिसने विपक्षी वोटों की एकजुटता को तोड़ दिया और ममता के 15 साल पुराने किले को ढहाकर रख दिया.
ये सभी घटनाएं और मुद्दे मिलकर एक ऐसे राजनीतिक तूफान में बदल गए, जिसने ममता बनर्जी के 15 साल पुराने किले को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनने की राह तैयार की.



