UP Politics: यूपी में मायावती ने काट दी पतंग, अखिलेश ने नहीं थामी डोर, अब क्या करेगी असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM?

बिहार विधानसभा चुनाव और महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में मिली सफलता के बाद असदुद्दीन ओवैसी की अगुवाई वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी AIMIM ने उत्तर प्रदेश में बड़े सियासी एंट्री का प्लान बनाया था. हाालंकि एंट्री से पहले ही ओवैसी की पार्टी को झटका लग गया है.
राज्य की यूपी इकाई के अध्यक्ष शौकत अली ने दावा किया था कि AIMIM, बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन को लेकर चर्चा कर रही है. अब बसपा मुखिया मायावती के बयान ने AIMIM की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.
राजधानी लखनऊ में एक प्रेस वार्ता के दौरान 18 फरवरी, बुधवार को मायावती ने पार्टी के पुराने रुख पर कायम रहते हुए कहा कि पार्टी किसी के साथ अलायंस नहीं करेगी क्योंकि उसे इसका नुकसान होता है. मायावती ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव करीब आते-आते ऐसे दावे और तेजी से किए जाएंगे लेकिन अंबेडकरवादियों को इससे सावधान रहना होगा.
बसपा चीफ के इस ऐलान के बाद AIMIM की रणनीतियों और उम्मीदों पर पानी फिर गया है. माना जा रहा था कि अगर बसपा, AIMIM के साथ अलायंस को तैयार हुई तो ओवैसी की पार्टी की चुनावों में ग्रैंड एंट्री होगी. पार्टी ने न सिर्फ 200 सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़ने का दावा किया बल्कि उनकी कोशिश थी कि बसपा के हाथी पर सवार होकर पतंग, न सिर्फ मुस्लिमों बल्कि दलितों और पिछड़ों को भी साथ लाकर यूपी में कमाल करे.
बसपा से अलायंस पर शौकत अली ने क्या कहा था?
एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने कहा था कि बसपा के साथ अलायंस करते हुए हम दलित मुस्लिम गठजोड़ का प्रयास करेंगे. हुकूमतें किसी की भी रही हो जुल्म का शिकार हमेशा मुसलमान रहा है. हम तो चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश में एमआईएम का गठबंधन बहुजन समाज पार्टी से हो. उत्तर प्रदेश में गठबंधन के लिए पार्टी की पहली पसंद बसपा है.
दरअसल, यूपी में 2027 के चुनाव में सबकी नजर मुस्लिम मतों पर है. इंडिया अलायंस के झंडे तले चुनाव लड़ने जा रही समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की भी कोशिश है कि 2024 के चुनावों में जो मुस्लिम मत उनकी ओर आकर्षित हुए वह 2027 में भी उनके साथ रहे. वहीं बसपा की कोशिश है कि 15 साल से वह जिस वर्ग को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है उसमें कोई सेंध न लगे. इसीलिए बसपा, किसी भी दल के साथ अलायंस करने की सोच से काम नहीं कर रही.
यूपी चुनाव 2027: क्या कहते हैं आंकड़े?
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 19 % है और लंबे समय से यह तबका सपा का मजबूत आधार माना जाता रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को लगभग 77 से 79 % मुस्लिम समर्थन मिला था, जबकि 2024 लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा 90 % से अधिक बताया गया. इस एकजुटता का सीधा असर सीटों पर दिखा.
विधानसभा चुनाव 2022 के अनुमानित आंकड़े बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को ब्राह्मण (लगभग 89%), ठाकुर (87%), वैश्य (83%) और अन्य अगड़े वर्गों में मजबूत समर्थन मिला था. वहीं समाजवादी पार्टी को यादव (83%) और मुस्लिम (करीब 79%) मतदाताओं का बड़ा समर्थन मिला.
उधर, लोकसभा चुनाव के संदर्भ में रिपोर्ट्स के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा और गठबंधन को 43 सीटों की सफलता मिली. मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा झुकाव सपा की ओर रहा जिसका लाभ कांग्रेस को भी मिला.
AIMIM से क्यों सब हैं अलर्ट?
अब सवाल है कि जब इतनी बड़ी संख्या मुस्लिम सपा और इंडिया अलायंस के साथ हैं तो आखिर AIMIM की एंट्री से वह इतना अलर्ट क्यों है? दरअसल, सपा की चिंता की वजह महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे भी हैं. जहां AIMIM ने 125 से अधिक सीटें जीतीं और कई मुस्लिम बहुल इलाकों में सपा जैसी पार्टियों को चुनौती दी. मुंबई के गोवंडी और मानखुर्द जैसे क्षेत्रों में सपा कमजोर पड़ी. एआईएमआईएम का आरोप रहा है कि सपा और कांग्रेस मुसलमानों को सिर्फ मतदाता समूह के रूप में देखती हैं.
यूपी में बंटवारे से हुआ नुकसान!
यूपी की सियासत में वोट बंटवारे का असर पहले भी देखा गया है. साल 2017 विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतों के विभाजन का लाभ बीजेपी को मिला. 82 मुस्लिम बहुल सीटों में से 62 पर बीजेपी ने जीत दर्ज की.
इसके उलट वर्ष 2022 में बड़े पैमाने पर मुस्लिम समर्थन सपा के साथ गया और पार्टी 111 सीटों तक पहुंची. हालांकि कुछ इलाकों में ओवैसी की एंट्री से सपा को नुकसान उठाना पड़ा.
राजनीतिक जानकारों की मानें तो ओवैसी के कारण अखिलेश मुरादाबाद, बिजनौर, भदोही,सहारनपुर, सुल्तानपुर और जौनपुर में कई विधानसभा सीटें कम अंतर से हार गए. 2024 लोकसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने उत्तर प्रदेश में उम्मीदवार नहीं उतारे, जिससे विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण कम हुआ और सपा को फायदा मिला.
बसपा का इनकार, अखिलेश का तंज, अब क्या करेगी AIMIM?
बीते दिनों जब सपा चीफ अखिलेश यादव से एआईएमआईएम की एंट्री के संदर्भ में पूछा गया था तो उन्होंने तंजिया लहजे में कहा था कि वह साइकिल पर सवार हो कर आएंगे.
अखिलेश के इस बयान से संकेत मिले कि ओवैसी कितनी भी कोशिश करें वह उन्हें यहां ज्यादा तव्ज्जो नहीं देगी और वह अपने वोट बैंक में किसी कीमत पर बंटवारा स्वीकार नहीं करेगी. वहीं अब मायावती की ओर से आए इनकार के बाद अब यह देखना होगा कि ओवैसी की पार्टी की रणनीति क्या होगी और वह इस झटके से कैसे उबरेगी?



