देश

‘पजामे की डोरी तोड़ना…’ इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादित फैसला सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द, जानें पूरा केस

नाबालिग लड़की के साथ रेप की कोशिश से जुड़े एक मामले में आए इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया है. 17 मार्च 2025 को दिए इस फैसले में हाई कोर्ट ने कहा था कि पीड़िता को खींचकर पुलिया के नीचे ले जाना, उसके ब्रेस्ट को पकड़ना और पजामे की डोरी को तोड़ना रेप की कोशिश नहीं कहलाएगा. फैसले को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के जजों और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े लोगों को यौन अपराध के मामलों में अधिक संवेदनशील बनने पर भी जोर दिया है. कोर्ट ने इस बारे में सुझाव देने के लिए एक विशेषज्ञ कमेटी के गठन का भी आदेश दिया है.

क्या था हाई कोर्ट का फैसला?

11 साल की लड़की के साथ हुई इस घटना के बारे में हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा का निष्कर्ष था कि यह महिला की गरिमा पर आघात का मामला है. इसे रेप या रेप का प्रयास नहीं कह सकते. जस्टिस मिश्रा ने मामले में 2 आरोपियों पर लगी आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार), 18 (अपराध की कोशिश) और पॉक्सो एक्ट की धारा हटा दी थी. उन्होंने 354-B (महिला को निर्वस्त्र करने के मकसद से बलप्रयोग) और पॉक्सो एक्ट की धारा 9 (गंभीर यौन हमला) के तहत मुकदमा चलाने को कहा था.

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

हाई कोर्ट जज के निष्कर्ष और उनकी टिप्पणियों के दूरगामी असर को देखते हुए सामाजिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट से संज्ञान का अनुरोध किया था. इसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनवाई शुरू की थी. सुनवाई की शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के विवादित आदेश पर रोक लगा दी थी. अब उसे पूरी तरह से निरस्त कर दिया है. ऐसे में मामले के आरोपियों पर अब रेप के प्रयास का मुकदमा चलेगा.

चीफ जस्टिस ने लिखा फैसला

3 जजों की बेंच की तरफ से चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने यह आदेश लिखा है. इसमें कहा गया है कि अपराध की तैयारी करना और अपराध का प्रयास करना 2 अलग-अलग बातें हैं. इस मामले में 11 साल की बच्ची को बाइक पर बैठाकर ले जाने, उसे सड़क से खींचकर पुलिया के नीचे ले जाने और उसके साथ यौन दुर्व्यवहार को सिर्फ रेप की तैयारी नहीं कहा जा सकता.

भविष्य के लिए बनेंगे दिशा-निर्देश

मामले की सुनवाई के दौरान कई वकीलों ने कोर्ट से अनुरोध किया था कि वह भविष्य के लिए दिशा-निर्देश बनाए. जजों ने सीधे ऐसा करने की बजाय एक विशेषज्ञ कमिटी को मामला सौंप दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल की राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) के निदेशक जस्टिस अनिरुद्ध बोस से अनुरोध किया है कि वह अपनी अध्यक्षता में एक कमिटी बनाएं. इसमें उनके अलावा 4 सदस्य हों. यह सदस्य कानून के जानकार, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता हों.

कमिटी क्या-क्या करेगी?

कोर्ट ने कमिटी को इन बातों पर काम करने के लिए कहा है :-

  • विशेषज्ञ कमिटी यौन अपराधों के मामलों में जजों और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील बनाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करे.
  • कमिटी उन कदमों का अध्ययन करे जो इस दिशा में कोर्ट या सरकार की तरफ से पहले उठाए गए हैं. यह भी देखा जाए कि उन उपायों का कितना असर पड़ा. ज़मीनी स्तर पर लोगों (जजों/वकीलों/सामाजिक संगठनों) से बात कर भविष्य के लिए सुझाव दें.
  • यह सिफारिशें जजों और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए एक दिशा-निर्देश की तरह हों. इनमें उन्हें यह भी बताया जाए कि वह यौन अपराध या इसी तरह के दूसरे अपराधों के उन मामलों में क्या-क्या करें जब शिकायतकर्ता, पीड़ित या गवाह कमज़ोर तबके से हो.
  • देश में भाषाई विविधता के बीच बहुत से ऐसे शब्द हैं, जो आपत्तिजनक होते हैं. ऐसे शब्द जिनका प्रयोग अपराध की श्रेणी में आ सकता है, फिर भी समाज में उनका इस्तेमाल होता है. कमिटी ऐसे शब्दों की सूची तैयार करे. इससे पीड़ित की बात सुनते समय जज और न्यायिक व्यवस्था के लोग उसके दर्द को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे.
  • कमिटी इस बात को भी याद रखे कि उसके काम के प्राथमिक लाभार्थी ऐसे लोग हैं जो समाज के कमज़ोर तबके से हैं. इनमें भी बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है. इसलिए, ड्राफ्ट गाइडलाइन ऐसी भाषा में हो जिसे आम लोग भी आसानी से समझ सकें. इसमें विदेशी भाषा के भारी भरकम तकनीकी शब्दों का इस्तेमाल न किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब कमिटी की रिपोर्ट उसके सामने पेश होगी तो वह आगे सुनवाई कर आदेश देगा.

AZMI DESK

Related Articles

Back to top button
WhatsApp Join Group!