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वंदे मातरम विवाद: मदरसा रशीदिया के मौलाना बोले- ‘देश महबूब है, लेकिन इबादत…’

केंद्र सरकार द्वारा सभी संवैधानिक कार्यक्रमों, बैठकों, संस्थाओं और स्कूलों में वंदे मातरम् के सभी छह छंद तीन मिनट 10 सेकेंड में गाना अनिवार्य किए जाने के निर्देश के बाद इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है. इसी क्रम में मदरसा अरबिया दारुल उलूम रशीदिया, जमीयत उलमा-ए-हिंद उत्तराखंड के अध्यक्ष मौलवी आरिफ ने मुस्लिम समाज की आपत्ति को स्पष्ट किया.

मौलवी आरिफ ने कहा, “वंदे मातरम को लेकर एतराज कोई नया विषय नहीं है, बल्कि यह धार्मिक अकीदे से जुड़ा पुराना मसला है. इस्लाम में ‘तौहीद’ यानी एकेश्वरवाद का सिद्धांत सर्वोपरि है, जिसके तहत इबादत केवल अल्लाह की ही की जा सकती है.”

उन्होंने आगे कहा, “वंदे मातरम को लेकर हमारा एतराज राजनीतिक नहीं बल्कि धार्मिक है. इस्लाम में इबादत सिर्फ एक अल्लाह की होती है. हम अपने देश से मोहब्बत करते हैं, उसकी तरक्की चाहते हैं, लेकिन अपने अकीदे से समझौता नहीं कर सकते. देश हमारे लिए महबूब है, मगर माबूद नहीं हो सकता.”

देशभक्ति और धार्मिक मान्यता अलग

मौलवी आरिफ ने ये भी कहा, “मुस्लिम समाज देश से मोहब्बत करता है और आजादी की लड़ाई में उलेमाओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. उन्होंने कहा कि वतन हमारे लिए महबूब है, लेकिन माबूद नहीं हो सकता. सजदा और इबादत केवल खालिक के लिए है, मखलूक के लिए नहीं.”

‘आजादी की लड़ाई में मुस्लिमों का योगदान’

इस अवसर पर साजिद हसन, मदरसा अरबिया दारुल उलूम रशीदिया, ज्वालापुर, हरिद्वार भी मौजूद रहे. उन्होंने कहा, “मुस्लिम समाज हमेशा से देशभक्ति के साथ खड़ा रहा है. आजादी की लड़ाई में हमारे बुजुर्गों ने कुर्बानियां दी हैं. लेकिन मजहबी मान्यताओं के खिलाफ कोई भी कदम समाज में असहजता पैदा कर सकता है. सरकार को चाहिए कि सभी धर्मों की भावनाओं का सम्मान करते हुए संतुलित निर्णय ले.”

साजिद हसन ने कहा कि धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए किसी भी निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए. यह मुद्दा धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गौरव के बीच संतुलन का सवाल उठाता है. जहां एक ओर सरकार राष्ट्रगान के रूप में वंदे मातरम को अनिवार्य बनाना चाहती है, वहीं मुस्लिम समाज का कहना है कि यह उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है. देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है.

AZMI DESK

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