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Intuition Thoughts: क्या होता है इनट्यूशन थॉट, हमारी जिंदगी को बदलने में ये कितने मददगार?

What Is Intuition Thought: खेल, बिजनेस और कला की दुनिया में हाई लेवल पर काम करने वाले लोग अक्सर कहते हैं कि वे अपने इनट्यूशन थॉट्स यानी अंदर की आवाज पर भरोसा करते हैं. यही इनट्यूशन उन्हें बिना ज्यादा सोचे, सही मौके पर तुरंत फैसला लेने में मदद करती है. कई बार यह फैसला पलक झपकते ही लेना पड़ता है, वरना मौका हाथ से निकल सकता है.चलिए आपको बताते हैं कि कि आखिर यह होता क्या है और  हमारी जिंदगी को बदलने में ये कितने मददगार है.

कैसे काम करता है इनट्यूशन थॉट?

खेल जगत में इसका सबसे सटीक उदाहरण बेसबॉल खिलाड़ियों में देखने को मिलता है. मेजर लीग बेसबॉल में गेंद की रफ्तार 90 मील प्रति घंटे से ज्यादा होती है.बल्लेबाज के पास सिर्फ करीब 150 मिलीसेकेंड का समय होता है यह तय करने के लिए कि उसे शॉट खेलना है या नहीं. गेंद आख़िरी कुछ फीट में आंखों से लगभग ओझल हो जाती है और हिटिंग जोन में बहुत कम समय के लिए रहती है. ऐसे में दिमाग के पास सोचने का वक्त नहीं होता, वहां सिर्फ अनुभव और इनट्यूशन ही काम करती है. टॉप खिलाड़ियों के फैसले इसलिए हमें “नेचुरल” लगते हैं.

हर इंसान के पास मौजूद होती है क्षमता

हालांकि, 2016 में प्रकाशित एक स्टडी साफ कहती है कि इनट्यूशन कोई खास ताकत नहीं है जो सिर्फ रिकॉर्ड तोड़ने वाले एथलीट्स या सफल लोगों के पास होती है. यह क्षमता हर इंसान में मौजूद होती है और सही तरीके से इसे मजबूत किया जा सकता है.

न्यूरोसाइंस के अनुसार, इंसानी दिमाग दो तरह की सोच पर काम करता है,एनालिटिकल और इनट्यूटिव. हार्वर्ड इनोवेशन लैब से जुड़ी ब्रेन-टेक कंपनी BrainCo के प्रेसिडेंट मैक्स न्यूलॉन बताते हैं कि एनालिटिकल सोच तर्क, आंकड़ों और प्लानिंग पर आधारित होती है, जबकि इनट्यूटिव सोच भावनाओं, अनुभव और बड़ी तस्वीर को समझने में मदद करती है. उदाहरण के तौर पर, घर खरीदने का फैसला लेते समय इनट्यूटिव व्यक्ति यह देखता है कि उसे वह जगह कैसी महसूस हो रही है, जबकि एनालिटिकल सोच वाला व्यक्ति बजट, स्कूल और दूरी जैसे फैक्टर्स पर ध्यान देता है.

खुद पर भरोसा बनाने से आती है फैसला लेने की क्षमता

तेज और सही इनट्यूटिव फैसले लेने की क्षमता खुद पर भरोसा बनाने से आती है. Toronto Blue Jays की एप्लाइड परफॉर्मेंस रिसर्च डायरेक्टर डॉ. देहरा हैरिस के मुताबिक इनट्यूशन को विकसित करने के लिए दो बातें जरूरी हैं कि अपनी अंदर की आवाज को सुनना और फैसलों के नतीजों पर नियमित रूप से विचार करना. हैरिस बताती हैं कि हमारे भीतर आमतौर पर दो आवाजें होती हैं. एक डर और बेचैनी से जुड़ी होती है, जबकि दूसरी शांत और सच्ची. फर्क पहचानने का तरीका यह है कि कौन-सी आवाज आपको शांति देती है. इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि समय-समय पर अपने फैसलों की समीक्षा की जाए, क्योंकि इनट्यूशन हमारे अनुभव और सीख से ही बनती है.

अल्बर्ट आइंस्टीन भी कह चुके हैं कि इनट्यूशन पहले के बौद्धिक अनुभवों का नतीजा होती है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि नियमित अभ्यास, सांस पर ध्यान, क्रिएटिव एक्टिविटीज और तनाव में भी शांत रहने की आदत इनट्यूशन को और मजबूत बनाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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AZMI DESK

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