‘पति को मर्जी से छोड़ सकती हैं मुस्लिम महिलाएं’, मौलाना मुफ्ती इफ्राहिम हुसैन ने बताया तरीका

एक ओर महिला सशक्तिकरण के लिए सरकार तमाम प्रयास कर रही है, वहीं, दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय में महिलाओं को भी शक्तियां दी गई हैं. इनके पीछे तर्क भी दिए गए हैं. अगर मुस्लिम महिलाएं खुद की मर्जी से अपने पतियों को छोड़ना चाहे तो तर्क के बाद वह अपने पतियों को छोड़ सकती हैं. इसके बाद वह कानून का भी सहारा ले सकती है. साफ तौर पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस्लाम में महिलाओं को शरीयत के हिसाब से ज्यादा शक्तियां प्रदान की गई हैं.
उत्तर प्रदेश के मुफ्ती के द्वारा कुछ तर्क दिए गए हैं, जिसमे बताया गया है कि इस्लाम में महिलाओं को पति खुद की मर्जी से छोड़ने की पूरी इजाजत है. इसके पीछे कई शर्ते बताई गई हैं. अलीगढ़ी के रहने वाले यूपी के चीफ मुफ्ती और वरिष्ट अधिवक्ता मौलाना इफ्राहिम हुसैन ने जानकारी के साथ तर्क दिए हैं.
क्या पति की मर्जी के बिना पत्नी तोड़ सकती है शादी?
मौलाना इफ्राहिम हुसैन से सवाल किया गया कि क्या पत्नी को बिना पति की मर्जी के शादी तोड़ने की इजाज़त है? इस पर उन्होंने कहा कि इस्लाम में निकाह एक मुक़द्दस अक़्द (कॉन्ट्रैक्ट) है. अगर पत्नी पर जुल्म हो, नफका (खर्च) न दिया जाए, या साथ निभाना नामुमकिन हो जाए, तो उसे अलग होने का हक़ है. “ख़ुला” आपसी रजामंदी से होता है. अगर पति राजी न हो और वजह ठोस हो, तो शरीअत के क़ाज़ी या अदालत के जरिए “फ़स्ख़-ए-निकाह” कराया जा सकता है. लेकिन इस सवाल के जवाब के पीछे भी पत्नी यानी ख़्वातून को शरियत में ज्यादा जगह दी गई है.
पत्नी किन शर्तों पर तोड़ सकती है पति से शादी?
दूसरा सवाल कि पत्नी किन शर्तों के साथ पति से शादी तोड़ने का अधिकार रखती है? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि शारीरिक या मानसिक अत्याचार नफका/रहन-सहन का इंतजाम न होना, गंभीर बीमारी या धोखा वैवाहिक हक़ अदा न होना. इन हालात में शरीअत और भारत का क़ानून—दोनों रास्ते मौजूद हैं. भारत में Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 के तहत भी महिला अदालत जा सकती है.
अगर दूल्हा पसंद न हो तब क्या कर सकती है पत्नी?
तीसरे सवाल अगर पत्नी को दूल्हा पसंद नहीं है और उसके साथ रहने का दिल नहीं है तब? चीफ मुफ्ती ने जवाब दिया कि अगर निकाह के बाद तालमेल न बने और पत्नी दिली तौर पर साथ न निभा पाए, तो वह “ख़ुला” की दरख्वास्त कर सकती है. आमतौर पर मेहर या कुछ हक़ लौटाकर आपसी सहमति से अलगाव होता है. अगर समझौता न हो, तो क़ाज़ी/फैमिली कोर्ट के ज़रिए न्याय लिया जा सकता है. उन्होंने बताया इस्लाम में औरत को बेबस नहीं छोड़ा. पहले सुलह की कोशिश हो, लेकिन जब रिश्ता निभाना नामुमकिन हो जाए, तो इज्जत और कानूनी तरीके से अलग होने का हक मौजूद है.



