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UGC के नियमों पर छात्र संगठनों के अलग-अलग सुर, किसने क्या कहा?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम, 2026’ को लेकर देशभर के छात्र संगठनों में बहस तेज हो गई है. जहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने विनियमों के उद्देश्य को सराहा है, वहीं शब्दावली और प्रावधानों में अस्पष्टता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. दूसरी ओर एनएसयूआई और आइसा ने इसे सामाजिक न्याय से जोड़ते हुए अलग-अलग दृष्टिकोण सामने रखे हैं.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कहना है कि यूजीसी द्वारा लाया गया यह विनियम उच्च शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है. हालांकि परिषद का मत है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियमों की भाषा स्पष्ट, संतुलित और सभी के लिए भरोसेमंद होनी चाहिए. अभाविप के अनुसार वर्तमान स्वरूप में कुछ प्रावधानों को लेकर समाज, विद्यार्थियों और अभिभावकों के बीच भ्रम की स्थिति बन रही है.

शैक्षणिक परिसरों में समरसता पर जोर

अभाविप ने यह भी दोहराया कि वह लंबे समय से शैक्षणिक परिसरों में सकारात्मक और समतामूलक वातावरण के लिए काम करती रही है. संगठन का मानना है कि विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए शिक्षा संस्थानों में सामाजिक सौहार्द और समान अवसर अनिवार्य हैं. इसी क्रम में अभाविप ने यूजीसी से अपील की है कि वह विनियमों पर उत्पन्न शंकाओं को दूर करने के लिए तत्काल स्पष्टीकरण जारी करें.

न्यायालय में लंबित मामले पर शीघ्र हलफनामे की मांग

अभाविप ने यह भी रेखांकित किया कि समता विनियमों से जुड़ा मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है. ऐसे में आयोग को चाहिए कि वह अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए शीघ्र हलफनामा दाखिल करे, ताकि किसी भी तरह की विभाजनकारी स्थिति से बचा जा सके और शैक्षणिक माहौल प्रभावित न हो.

भ्रांतियां दूर करने के लिए संवाद जरूरी : वीरेंद्र सिंह सोलंकी

अभाविप के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि शैक्षणिक परिसरों में समानता और सौहार्द बनाए रखना समय की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार के भेदभाव के लिए शिक्षा संस्थानों में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. विनियमों को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए यूजीसी को सभी हितधारकों से संवाद स्थापित करना चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों को और मजबूत किया जा सके.

जाति आधारित भेदभाव पर कार्रवाई का स्वागत : एनएसयूआई

वहीं एनएसयूआई ने यूजीसी के समता विनियमों को परिसरों में जाति आधारित भेदभाव से निपटने की दिशा में आवश्यक कदम बताया है. संगठन ने कहा कि प्रस्तावित समिति केवल औपचारिक न होकर प्रभावी और स्वतंत्र होनी चाहिए. एनएसयूआई का जोर है कि समिति में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के छात्रों के साथ-साथ इसी पृष्ठभूमि के शिक्षण संकाय को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए.

स्वतंत्र और सशक्त समिति की जरूरत

एनएसयूआई ने यह आशंका भी जताई कि यदि समिति विश्वविद्यालय प्रशासन के नियंत्रण में रही, तो समानता और न्याय का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है. संगठन ने सुझाव दिया कि पारदर्शिता और विश्वसनीयता के लिए समिति में सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की भागीदारी भी होनी चाहिए.

पिछले अनुभव और मौजूदा चुनौतियां

एनएसयूआई ने कहा कि पूर्व में गठित कई समितियां केवल औपचारिकता तक सीमित रहीं और शिकायतों का प्रभावी समाधान नहीं कर सकीं. संगठन ने आरक्षण नीतियों के कमजोर क्रियान्वयन, शिक्षण पदों में रिक्तियों, उच्च ड्रॉपआउट दर और प्रतिष्ठित संस्थानों में आत्महत्या के मामलों का उल्लेख करते हुए ठोस हस्तक्षेप की आवश्यकता बताई.

यूजीसी समता दिशानिर्देशों पर रोक का विरोध : आइसा

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी समता दिशा निर्देश 2026 पर लगाई गई रोक की कड़ी आलोचना की है. आइसा ने इसे सामाजिक न्याय के प्रयासों के खिलाफ कदम बताते हुए कहा कि यह संस्थागत जातिवाद की गहरी जड़ों को उजागर करता है. संगठन का मानना है कि सामाजिक न्याय से जुड़े उपायों पर रोक संविधान की मूल भावना के विपरीत है.

रोहित एक्ट लागू करने की मांग तेज

आइसा ने राष्ट्रीय स्तर पर रोहित एक्ट लागू करने की मांग को दोहराया है. संगठन का कहना है कि कर्नाटक सरकार द्वारा तैयार किया गया रोहित एक्ट उच्च शिक्षा संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ होने वाली संस्थागत हिंसा से निपटने का अधिक व्यापक और प्रभावी प्रयास है.

यूजीसी के समता विनियम 2026 को लेकर उच्च शिक्षा में समानता का मुद्दा फिर से चर्चा में है. हालांकि, छात्र संगठन इसके उद्देश्य से सहमत हैं, लेकिन प्रावधानों की स्पष्टता और प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में जरूरत है कि यूजीसी सभी पक्षों को साथ लेकर भ्रम दूर करे और समता के लक्ष्य को व्यवहार में उतारे.

AZMI DESK

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