जहां पहुंच सकती है पाइप गैस, वहां नहीं मिलेगा सिलेंडर? सरकार के नए नियमों में क्या-क्या शामिल, जानें

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर खतरे ने पूरी दुनिया की एनर्जी सप्लाई को हिला दिया. दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरते हैं ऐसे में इस रूट पर जरा सा भी खतरा सीधे ग्लोबल मार्केट को प्रभावित करता है. भारत जो अपनी LPG जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है इस संकट से अछूता नहीं रहा लेकिन इस बार भारत ने सिर्फ हालात संभालने की कोशिश नहीं की बल्कि पूरे सिस्टम को बदलने का फैसला लिया. LPG शिपमेंट में देरी होने लगी ट्रांसपोर्ट और फ्रेट लागत बढ़ गई और घरेलू बाजार में सप्लाई का दबाव महसूस होने लगा.
सरकार का बड़ा कदम: LPG मॉडल में बदलाव
इसी सोच के साथ सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत नया आदेश लागू किया, जिसका मकसद साफ है, जहां पाइप गैस पहुंच सकती है, वहां सिलेंडर पर निर्भरता खत्म की जाए. इस नीति का सबसे अहम हिस्सा “PNG फर्स्ट” अप्रोच है. अब जिन शहरी इलाकों में पाइप्ड नैचुरल गैस उपलब्ध है, वहां धीरे-धीरे LPG सिलेंडर को हटाया जाएगा. इससे गैस सप्लाई ज्यादा स्थिर होगी और लॉजिस्टिक्स पर होने वाला खर्च भी कम होगा साथ ही आयात पर निर्भरता घटेगी.
इंफ्रास्ट्रक्चर की सबसे बड़ी बाधा हटाई गई
अब तक पाइपलाइन बिछाने में सबसे बड़ी समस्या अलग-अलग एजेंसियों से अनुमति लेना था जिसमें महीनों नहीं बल्कि कई बार साल लग जाते थे. नए आदेश में इस बाधा को सीधे खत्म करने की कोशिश की गई है. सरकार ने GAIL, IGL, MGL और Adani Total Gas जैसी कंपनियों को अनिवार्य मार्ग का अधिकार (Mandatory Right of Way) दिया है. इसका मतलब है कि अब रेलवे, हाईवे अथॉरिटी या स्थानीय निकाय पाइपलाइन प्रोजेक्ट को रोक नहीं पाएंगे। इससे गैस नेटवर्क का विस्तार पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से हो सकेगा.
क्लियरेंस सिस्टम में बड़ा बदलाव
इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी की एक और बड़ी वजह मंजूरी प्रक्रिया थी। इसे भी पूरी तरह बदल दिया गया है. अब शहरी इलाकों में पाइपलाइन से जुड़े प्रोजेक्ट्स को 10 दिन के भीतर मंजूरी देना अनिवार्य होगा जबकि राष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट्स के लिए 60 दिन की समयसीमा तय की गई है. अगर इस अवधि में कोई जवाब नहीं आता है तो उसे स्वतः मंजूरी यानी Deemed Clearance माना जाएगा। यह वही मॉडल है जिसने देश में हाईवे और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार को गति दी थी.
कंपनियों और बाजार पर असर
इस फैसले का असर सिर्फ उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी गैस इंडस्ट्री पर दिखेगा। GAIL के लिए यह नेटवर्क विस्तार और ट्रांसमिशन रेवेन्यू बढ़ाने का मौका है वहीं IGL और MGL जैसी कंपनियों के लिए घरेलू और CNG डिमांड में तेज बढ़ोतरी की संभावना है. इंडस्ट्रियल सेक्टर में Gujarat Gas जैसी कंपनियों को फायदा होगा क्योंकि ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ तेजी से बढ़ेगी. दूसरी ओर पेट्रोनेट LNG जैसे खिलाड़ियों के लिए LNG इंपोर्ट की मांग बढ़ सकती है. तेल कंपनियां जैसे IOC, BPCL और HPCL भी अब अपने पेट्रोल पंपों को मल्टी-एनर्जी हब में बदलने की दिशा में तेजी ला सकती हैं.
भारत की बड़ी रणनीति – एनर्जी सिक्योरिटी की ओर कदम
यह बदलाव सिर्फ LPG तक सीमित नहीं है बल्कि भारत की पूरी एनर्जी रणनीति का हिस्सा है. सरकार अब सप्लाई सोर्स को विविध बनाने पर काम कर रही है जहां पहले लगभग 27 देशों से इंपोर्ट होता था उसे बढ़ाकर 40 से ज्यादा देशों तक ले जाने की योजना है. इसके साथ ही भारत अपनी एनर्जी मिक्स में गैस की हिस्सेदारी को मौजूदा लगभग 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत तक ले जाना चाहता है. ट्रांसपोर्ट सेक्टर में भी LCNG, CNG और इलेक्ट्रिक व्हीकल इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से बढ़ाया जा रहा है ताकि तेल पर निर्भरता कम हो सके.
संकट से निकला नया सिस्टम
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत अब सिर्फ संकट आने पर प्रतिक्रिया देने की नीति से आगे बढ़ रहा है. ईरान जंग ने एक जोखिम जरूर पैदा किया लेकिन उसी जोखिम ने भारत को अपनी सबसे कमजोर कड़ीLPG सप्लाई और लॉजिस्टिक्स को सुधारने का मौका दिया.



