Ankita Bhandari Case: सफेद पट्टियां, हाथों में तख्तियां और आंखों में सवाल… आखिर कब पकड़े जाएंगे ‘वीआईपी’

26 फरवरी की सुबह देहरादून में एक अलग तरह का माहौल था. न कोई शोर, न नारेबाजी, न भीड़ की अराजकता. बस हाथों में तख्तियां, मुंह पर सफेद पट्टियां और आंखों में वह खामोश दर्द जो शब्दों से कहीं ज्यादा बोलता है. ‘अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच’ के आह्वान पर सैकड़ों लोग सड़कों पर उतरे और इस बार उनकी चुप्पी किसी चीख से कम नहीं थी.
सुबह करीब ग्यारह बजे से ही गांधी पार्क में लोग जमा होने लगे थे. अलग-अलग उम्र और अलग-अलग तबके से आए लोग, लेकिन सबके मन में एक ही सवाल. वक्ताओं ने मंच से कहा कि यह लड़ाई किसी एक परिवार की नहीं है, यह उस व्यवस्था से सवाल पूछने की लड़ाई है जो ताकतवरों के सामने बार-बार झुकती नजर आती है.
खामोशी में लिपटा मार्च, लेकिन संदेश बुलंद
दोपहर 12.00 बजे गांधी पार्क से राजभवन तक मौन मार्च शुरू हुआ. पूरे रास्ते एक असाधारण अनुशासन देखने को मिला. किसी ने ऊंची आवाज में कुछ नहीं कहा, लेकिन बैनरों पर लिखे शब्द सड़क के दोनों तरफ खड़े लोगों तक पहुंचते रहे. मुंह पर बंधी सफेद पट्टियां जैसे यह कह रही थीं कि हमारी आवाज दबाई जा रही है और यही हमारा प्रतिरोध है.
राजधानी की उन सड़कों पर जहां रोज राजनीतिक बयानबाजी होती है, उस दिन एक अलग किस्म की राजनीति चल रही थी. आम आदमी की राजनीति, जिसमें कोई माइक नहीं था, कोई मंच नहीं था बस एक सामूहिक संकल्प था.
राज्यपाल के जरिए राष्ट्रपति तक पहुंची बात
राजभवन पहुंचकर प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन सौंपा. ज्ञापन में मांग की गई कि इस पूरे मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के किसी वरिष्ठ न्यायाधीश की सीधी निगरानी में कराई जाए. इसके अलावा मांग रखी गई कि जिन कथित वीआईपी लोगों के नाम इस कांड से जुड़े हैं, उनके खिलाफ तत्काल मुकदमा दर्ज हो और जो लोग सबूत मिटाने या दोषियों को बचाने में लगे रहे. उन पर भी सख्त कानूनी शिकंजा कसा जाए. मंच के पदाधिकारियों ने साफ कहा कि जब तक पारदर्शी जांच नहीं होती और दोषियों को सजा नहीं मिलती, यह आंदोलन थमने वाला नहीं है.
गैरसैंण तक पहुंचेगी यह आवाज
बैठक में यह भी तय किया गया कि गैरसैंण में चल रहे विधानसभा के बजट सत्र के दौरान भी प्रदर्शन किए जाएंगे. मंच का मानना है कि जनता की इस पीड़ा को विधानसभा की दहलीज तक पहुंचाना जरूरी है ताकि सरकार इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़े और कोई ठोस, स्पष्ट रुख अपनाए.
अंकिता हत्याकांड अब महज एक आपराधिक मामला नहीं रहा. यह उस बड़े सवाल का प्रतीक बन गया है कि क्या इस देश में एक आम परिवार की बेटी को न्याय मिल सकता है? जब सामने वाले के पास पैसा हो, पहुंच हो और सत्ता का संरक्षण हो. 26 फरवरी का यह मौन मार्च शांति से शुरू हुआ और शांति से समाप्त भी हुआ, लेकिन देहरादून की उस दोपहर में एक सवाल हवा में तैरता रह गया जिसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है.
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