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Explained: ‘पानी, सफाई और बिजली जैसी जरूरतें पूरी करतीं…’, 33% आरक्षण के बीच पंचायत में महिलाओं की कितनी हिस्सेदारी?

महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की कहानी पंचायतों से शुरू होती है, जहां संवैधानिक संशोधन ने एक क्रांति की नींव रखी. अब जब देश में 33% महिला आरक्षण को लेकर बहस फिर तेज है, तो सबसे अहम सवाल यही है कि पंचायतों में इस आरक्षण का असल में क्या असर हुआ और वहां महिलाओं की संख्या कितनी पहुंची. आइए जानते हैं एक्सप्लेनर में…

सवाल 1: पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान कब और कैसे शुरू हुआ?
जवाब: भारत में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की नींव 1992 के 73वें और 74वें संविधान संशोधन में रखी गई. 73वें संशोधन (अनुच्छेद 243D) के तहत, पंचायतों की कुल सीटों और सरपंच/अध्यक्ष पदों पर कम से कम एक-तिहाई (33%) आरक्षण महिलाओं के लिए अनिवार्य कर दिया गया. यह आरक्षण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के अंतर्गत भी लागू हुआ. नगर पालिकाओं के लिए भी 74वें संशोधन के तहत समान प्रावधान किए गए.

यह कदम इसलिए क्रांतिकारी था क्योंकि इसने महिलाओं को जमीनी स्तर की राजनीति में औपचारिक रूप से शामिल होने का संवैधानिक अधिकार दिया. इससे पहले उनकी भागीदारी न के बराबर थी.

 

संविधान में 73वें संशोधन से पहले पंचायत में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम थी
संविधान में 73वें संशोधन से पहले पंचायत में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम थी

सवाल 2: पंचायतों में आज महिला प्रतिनिधियों की वास्तविक संख्या कितनी है और यह आंकड़ा क्या बताता है?
जवाब: पंचायतों में महिलाओं की संख्या 33% के लक्ष्य को पार कर चुकी है और यह एक बड़ी सफलता की कहानी है, लेकिन इसके आंकड़ों को सही संदर्भ में समझना जरूरी है:

  • केंद्र सरकार के अनुसार, वर्तमान में देशभर की पंचायतों में 49.7% से ज्यादा निर्वाचित प्रतिनिधि महिलाएं हैं.
  • कई अन्य स्रोत इस आंकड़े को लगभग 46% के आसपास बताते हैं, जो फिर भी निर्धारित 33% के कोटे से कहीं अधिक है.
  • पूर्ण संख्या में, पंचायतों के लगभग 40 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों में 13 लाख से ज्यादा महिलाएं हैं.

इस आंकड़े के 2 बड़े महत्व हैं:

  • कोटे से आगे: इसका सीधा मतलब है कि महिलाएं न केवल आरक्षित सीटों पर जीत रही हैं, बल्कि सामान्य (अनारक्षित) सीटों पर भी चुनाव लड़कर जीत हासिल कर रही हैं.
  • राज्यों की पहल: इस सफलता का एक बड़ा कारण यह है कि 21 राज्यों ने अपने कानूनों में संशोधन कर पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 50% कर दी है. इनमें आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख राज्य शामिल हैं.

 

सवाल 3: पंचायतों में महिलाओं की बढ़ी संख्या का क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ा है?
जवाब: महिलाओं की बढ़ी हुई भागीदारी का प्रभाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने गांवों की शासन-व्यवस्था और विकास की प्राथमिकताओं को बदला है:

  • शासन में बदलाव: पंचायतों पर हुई रिसर्च बताती हैं कि महिला नेता उन मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देती हैं जिन्हें पहले अनदेखा किया जाता था. जैसे कि पेयजल, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और पोषण. उनके नेतृत्व में इन बुनियादी जरूरतों पर खर्च और नीतिगत ध्यान बढ़ा है.
  • जागरूकता और भागीदारी: इसने आम महिलाओं की ग्राम सभाओं में भागीदारी को बढ़ावा दिया है, जो 68% से 78% तक पहुंच गई है. महिला प्रतिनिधियों ने ग्रामीण समाज में राजनीतिक जागरूकता और आत्मविश्वास का एक नया माहौल बनाया है.

सवाल 4: क्या संख्या बढ़ने के बावजूद महिला सशक्तिकरण की राह में कोई बड़ी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं?
जवाब: बिल्कुल. यह तस्वीर का एक स्याह पक्ष है, जिसे ‘सरपंच पति’ या प्रॉक्सी शासन की समस्या के नाम से जाना जाता है. यह पंचायतों में महिला सशक्तिकरण के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. सरपंच पति का मतलब है कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधि, खासकर सरपंच, केवल नाम की मोहर होती हैं और असली सत्ता और निर्णय उनके पति या परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों के हाथों में होती है.

वास्तविकता के उदाहरण:

  • हरियाणा के कई इलाकों में, महिला सरपंचों को केवल रबर स्टैंप की तरह इस्तेमाल करने की शिकायतें आम हैं.
  • छत्तीसगढ़ के परसवाड़ा गांव का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें नवनिर्वाचित महिलाओं की जगह उनके पति शपथ ले रहे थे. इस घटना ने देशभर में इस समस्या की गंभीरता को उजागर किया.
  • अक्सर गांव के प्रभुत्वशाली और संपन्न वर्ग की महिलाएं ही इन पदों पर काबिज होती हैं, जिससे समाज के हाशिए पर खड़े गरीब और दलित महिलाओं को सशक्तिकरण का असली लाभ नहीं मिल पाता.
  • कई महिला प्रतिनिधि कम पढ़ी-लिखी और अनुभवहीन होती हैं, जिसका फायदा उठाकर पुरुष अधिकारी और परिवार के लोग उन पर हावी रहते हैं.
  • हर चुनाव में सीटों के आरक्षण बदलने से एक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि लगातार काम नहीं कर पाती, जिससे उसका राजनीतिक विकास रुक जाता है.

यानी तस्वीर साफ है कि पंचायतों में महिला आरक्षण ने संख्या के लिहाज से एक बड़ी सफलता हासिल की है, लेकिन यह संख्या जमीन पर वास्तविक सशक्तिकरण में तब तक नहीं बदल सकती, जब तक गहरी जड़ें जमाए पितृसत्तात्मक सोच और सामाजिक बुराइयों को खत्म नहीं किया जाता. यह उपलब्धि एक ‘अधूरी क्रांति’ का प्रतीक है, जिसकी सफलता केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत में निहित है.

AZMI DESK

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