Explained: सिर्फ केरल में सरकार बना पाई कांग्रेस! 141 साल पुरानी पार्टी कैसे 4 राज्यों तक सिमटी, पतन के 5 बड़े संकेत

साल 1951-52 में देश का पहला आम चुनाव हुआ था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने 489 में से 364 सीटों पर कब्जा जमाया था और उसका वोट शेयर करीब 45% था. यह वह दौर था जब एक अकेली पार्टी पूरे देश की सत्ता पर काबिज थी. लेकिन आज 70 साल बाद, वही कांग्रेस महज चार राज्यों की सरकार तक सिमट कर रह गई है. कभी देश की दिशा और दशा तय करने वाली इस 140 साल पुरानी पार्टी की गिनती अब आखिरी सांसों में हो रही है या यह एक नई शुरुआत का इंतजार है?
400 से ज्यादा सीटें जीतकर गांव-गांव पहुंची कांग्रेस
कांग्रेस ने अपनी सियासी जमीन पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे कद्दावर नेताओं के जरिए तैयार की. 1952 से 2014 के बीच करीब 50 साल से ज्यादा समय तक पार्टी ने केंद्र की सत्ता संभाली. 1984 के चुनावों में तो कांग्रेस को रिकॉर्ड 400 से ज्यादा सीटें मिली थीं. यह वह समय था जब कांग्रेस का जनाधार हिंदू बहुल समाज से लेकर अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों तक फैला हुआ था. पार्टी का संगठन गांव-गांव तक मजबूत था और ‘कांग्रेस प्रणाली’ नाम से एक पूरी व्यवस्था चलती थी.
कांग्रेस के बिखराव की शुरुआत कब और कैसे हुई?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि कांग्रेस का असली पतन 1989 के बाद शुरू हुआ, जब वह केंद्र की पूर्ण बहुमत की सत्ता से बाहर हुई और उसे गठबंधन की राजनीति पर निर्भर रहना पड़ा. भ्रष्टाचार के आरोप, संगठन में आंतरिक गुटबाजी और क्षेत्रीय दलों के उदय ने पार्टी की जड़ों को खोखला करना शुरू कर दिया. फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का तख्ता पलट गया और वह सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गई, जबकि उसका वोट शेयर 19.3% रह गया था. 2019 में मामूली सुधार के बाद 2024 में पार्टी ने 99 सीटें और 21.26% वोट शेयर हासिल किया, लेकिन फिर भी वह मोदी लहर के आगे बौनी साबित हुई.
मौजूदा हकीकत: सिर्फ 4 राज्यों की सरकार
2026 की ताजा स्थिति पर नजर डालें तो कांग्रेस के पास इस वक्त सिर्फ चार राज्यों में ही अपनी सरकार है. 2026 के विधानसभा चुनावों में केरल में बड़ी जीत के बाद, कांग्रेस अब तीन दक्षिण राज्यों- कर्नाटक, तेलंगाना और केरल के अलावा उत्तर भारत में सिर्फ हिमाचल प्रदेश की सत्ता पर काबिज है. झारखंड में वह JMM के साथ गठबंधन में सरकार का हिस्सा है, लेकिन वहां नेतृत्व हेमंत सोरेन के पास है.
बिहार और तमिलनाडु जैसे राज्यों में पार्टी या तो छोटे सहयोगी की भूमिका में है या पूरी तरह हाशिए पर है. वहीं, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और असम जैसे राज्यों में कांग्रेस का जनाधार या तो खत्म हो चुका है या बेहद कमजोर है.
कांग्रेस के सिमटने के पांच बड़े कारण क्या हैं?
कांग्रेस के पतन को किन्हीं एक-दो वजहों से नहीं समझा जा सकता, इसके पीछे एक सुनियोजित सियासी प्रक्रिया है:
- कमजोर नेतृत्व और संगठनात्मक कलह: राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी को 95 से ज्यादा चुनावी हार का सामना करना पड़ा है. आंतरिक गुटबाजी और हाईकमान का जमीनी हकीकत से कटाव पार्टी को लगातार कमजोर कर रहा है.
- विचारधारा का संकट: बीजेपी ने कांग्रेस को ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की राजनीति के रूप में पेश किया, जिससे हिंदू बहुल मतदाताओं का विश्वास डिग गया.
- बीजेपी का उदय और ध्रुवीकरण: 2014 के बाद से कांग्रेस को उत्तर भारत के किसी भी मुकाबले में सीधी जीत नहीं मिली है, क्योंकि बीजेपी धार्मिक आधार पर सफलतापूर्वक ध्रुवीकरण करने में सफल रही है.
- दल-बदल और पार्टी छोड़ने का सिलसिला: 2014 के बाद सैकड़ों नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस छोड़कर बीजेपी या अन्य दलों में शामिल हो गए. यह रुझान 2017 से 2021 के बीच अपने चरम पर था.
- गठबंधन की राजनीति में अविश्वास: इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल, चाहे वह तृणमूल कांग्रेस हो या आम आदमी पार्टी, कांग्रेस को राष्ट्रीय नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, जिससे विपक्षी एकता कमजोर हुई है.
तो क्या खत्म होने वाली है कांग्रेस पार्टी?
इस सवाल का जवाब आसान नहीं है. हालांकि इंडिया गठबंधन सिर्फ 6 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश तक सिमट गया है और कई बीजेपी नेता इसे ‘केरल के बाहर न के बराबर’ बता रहे हैं. इसके बावजूद राजनीति में भविष्यवाणी करना मुश्किल है. 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों ने यह जरूर साबित किया कि पार्टी में अभी भी लड़ने की ताकत बाकी है. दक्षिण भारत में पार्टी का बढ़ता प्रभाव और ‘भारत जोड़ो यात्रा’ जैसे आंदोलनों ने कार्यकर्ताओं में जोश भरा है.
लेकिन पार्टी का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह कितनी जल्दी अपनी कमजोरियों को दूर करती है. कांग्रेस को एक मजबूत संगठन खड़ा करना, जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों को फिर से साधना और एक स्पष्ट वैचारिक दिशा तय करना होगा. ये वे चुनौतियां हैं जिनसे पार्टी को उबरना होगा. अगर कांग्रेस यह कर पाने में नाकाम रही, तो इतिहास की किताबों में उसकी कहानी एक ‘सुनहरे अतीत’ तक सिमट कर रह जाएगी.



