Heart Ultrasound Test: हार्ट फेल्योर को पहले ही डिटेक्ट कर लेगी यह तकनीक, जानें मेडिकल फील्ड में कैसे आ रही क्रांति?

Can AI Detect Heart Failure Early: हार्ट फेल्योर एक गंभीर बीमारी है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है. यह तब होती है, जब दिल शरीर में खून को ठीक से पंप नहीं कर पाता. बीमारी के बढ़े हुए चरण में यह जानलेवा भी बन सकती है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसे समय रहते पहचान पाना आसान नहीं होता. डॉक्टरों के सामने यही सबसे बड़ी समस्या है कि कई मरीजों में एडवांस्ड हार्ट फेल्योर का पता देर से चलता है, जिससे उन्हें सही समय पर इलाज नहीं मिल पाता. अब एक नई रिसर्च से उम्मीद जगी है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI इस स्थिति को बदल सकता है.
अभी किस तकनीक का यूज होता है
यह स्टडी वील कॉर्नेल मेडिसिन, कॉर्नेल टेक,कोलंबिया विश्वविद्यालय और न्यूयॉर्क-प्रेस्बिटेरियन के साइंटिस्ट ने किया गया है, जो जर्नल एनपीजे डिजिटल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ. फिलहाल एडवांस्ड हार्ट फेल्योर की पहचान के लिए डॉक्टर एक खास टेस्ट कार्डियोपल्मोनरी एक्सरसाइज टेस्टिंग का सहारा लेते हैं. यह टेस्ट दिल और फेफड़ों की काम करने की क्षमता को मापता है, लेकिन इसके लिए विशेष उपकरण और ट्रेंड स्टाफ की जरूरत होती है, जो केवल बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध होता है. इसी वजह से कई मरीज इस जांच से वंचित रह जाते हैं.
रिसर्च में क्या निकला
नई रिसर्च में साइंटिस्ट ने एक ऐसा एआई सिस्टम तैयार किया है, जो दिल की अल्ट्रासाउंड जांच इकोकार्डियोग्राफी और मरीज के सामान्य मेडिकल रिकॉर्ड का एनालिसिस करके बीमारी की गंभीरता का अंदाजा लगा सकता है. खास बात यह है कि यह तकनीक पीक VO2 जैसे महत्वपूर्ण पैरामीटर का अनुमान लगा सकती है, जो आमतौर पर केवल CPET के जरिए ही मापा जाता है.
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1,000 हार्ट फेल्योर मरीजों के डेटा का इस्तेमाल
इस सिस्टम को तैयार करने के लिए करीब 1,000 हार्ट फेल्योर मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया गया, जिसमें अल्ट्रासाउंड वीडियो, ब्लड फ्लो और हार्ट वॉल्व की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी शामिल थी. इसके बाद 127 नए मरीजों पर इसका परीक्षण किया गया, जहां इस एआई मॉडल ने करीब 85 प्रतिशत सटीकता के साथ हाई-रिस्क मरीजों की पहचान की. रिसर्चर का कहना है कि यह तकनीक रोजमर्रा की मेडिकल जरूरतों में आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है, क्योंकि इसमें वही डेटा उपयोग होता है जो पहले से उपलब्ध होता है. इससे उन मरीजों की पहचान संभव हो सकेगी, जो अभी तक नजरअंदाज हो रहे थे.
हालांकि, साइंटिस्ट ने यह भी माना है कि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले और बड़े स्तर पर टेस्ट जरूरी है. एआई सिस्टम की विश्वसनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही अहम है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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